नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में एक बार फिर इतिहास को लेकर बहस गरमा गई है. पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के एक पुराने इंटरव्यू का वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने महमूद गजनवी और लोदी शासकों को बाहरी नहीं बल्कि भारतीय मूल का बताया.
बीजेपी ने इस पर कांग्रेस को यह कहते हुए घेरा है कि कांग्रेस का पूरा तंत्र ऐसे लोगों को बढ़ावा देता है जो हिंदुओं पर अत्याचार करने वालों का महिमामंडन करते हैं. इस विवाद ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी है, जहां बीजेपी ने कांग्रेस की विचारधारा पर सवाल उठाए.
हामिद अंसारी ने अपने इंटरव्यू में कहा कि महमूद गजनवी और लोदी वंश के शासक बाहर से नहीं आए थे. उन्होंने अफगानिस्तान को प्राचीन भारत का हिस्सा बताते हुए इन शासकों को स्थानीय लुटेरा करार दिया. हामिद अंसारी के इस बयान के सामने आने के बाद से जहां एक तरफ राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है, वही सोशल मीडिया पर भी इसको लेकर बहस तेज हो गई है.
बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने इस वीडियो को सोशल मीडिया पर साझा किया और कांग्रेस पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि कांग्रेस का सिस्टम हिंदू-विरोधी तत्वों को बढ़ावा देता है. पूनावाला ने गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर की तबाही का जिक्र करते हुए कांग्रेस को आड़े हाथों लिया.
पूनावाला ने आरोप लगाया कि कांग्रेस औरंगजेब जैसे शासकों के अपराधों को छिपाती है और सोमनाथ स्वाभिमान दिवस का विरोध करती है. उन्होंने दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम का नाम लेकर कहा कि कांग्रेस अलगाववादी सोच वालों के साथ खड़ी रहती है. यह बयान पार्टी के बीच मतभेदों को उजागर करता है.
#WATCH | Delhi | BJP spokesperson Shehzad Poonawala says, "The Congress ecosystem always eulogises Hindu haters. Whoever attacks or commits atrocities on Hindus is always subjected to whitewashing by the Congress ecosystem. Now, Hamid Ansari says that Ghazni was not a cruel… pic.twitter.com/oe10oS86Sx
— ANI (@ANI) January 30, 2026
गौरतलब है कि हामिद अंसारी 2007 में उपराष्ट्रपति बनने से पहले कांग्रेस से जुड़े थे. उनके बयान में गजनवी के भारत पर हमलों और लोदी वंश के दिल्ली सल्तनत के अंतिम दिनों का संदर्भ था. इब्राहिम लोदी को 1526 में बाबर ने हराया था. अंसारी ने तर्क दिया कि उस दौर में क्षेत्रीय सीमाएं अलग थीं.
यह विवाद बीजेपी और कांग्रेस के बीच वैचारिक टकराव को बढ़ावा दे रहा है. इतिहास की व्याख्या पर उठे सवालों से सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है. विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मुद्दे चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं, जहां धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान प्रमुख भूमिका निभाती है. आने वाले दिनों में इस पर और प्रतिक्रियाएं आ सकती हैं.