कल्पना कीजिए...एक विशाल ब्रिटिश अदालत. सामने अंग्रेज जज, सरकारी वकील और भारी पुलिस सुरक्षा. कटघरे में खड़ा एक भारतीय, जिस पर राजद्रोह, साजिश या सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप है. अंग्रेजों को विश्वास था कि अदालत उनके शासन की ताकत का प्रतीक है. लेकिन कई बार यही अदालतें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे प्रभावशाली आवाज बन गईं.
स्वतंत्रता संग्राम केवल सड़कों, जेलों और युद्धभूमि तक सीमित नहीं था. इसकी एक महत्वपूर्ण लड़ाई अदालतों के भीतर भी लड़ी गई. मुकदमों के जरिए ब्रिटिश सरकार आंदोलन को कुचलना चाहती थी, जबकि भारतीय नेता और क्रांतिकारी इन्हीं मुकदमों का इस्तेमाल जनता तक अपने विचार पहुंचाने के लिए करते थे.
आइए जानते हैं उन ऐतिहासिक कानूनी लड़ाइयों के बारे में, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी.
यदि किसी मुकदमे ने पूरे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस छेड़ी, तो वह लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का राजद्रोह मुकदमा था.
तिलक पर आरोप लगाया गया कि उनके समाचारपत्र 'केसरी' में प्रकाशित लेखों ने सरकार के खिलाफ लोगों को भड़काया. 1897 में उन्हें सजा हुई और 1908 में फिर राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर छह वर्ष के लिए बर्मा (अब म्यांमार) के मांडले जेल भेज दिया गया.
यह मुकदमा केवल एक व्यक्ति का नहीं था. इसने यह सवाल खड़ा किया कि क्या सरकार की आलोचना करना अपराध है? यही बहस आगे चलकर भारतीय प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बनी.
30 अप्रैल 1908 को मुजफ्फरपुर में बम विस्फोट के बाद ब्रिटिश सरकार ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कीं. इस मामले में अरविंद घोष (श्री अरविंद) सहित कई क्रांतिकारियों पर मुकदमा चला.
इस मुकदमे में प्रसिद्ध वकील चित्तरंजन दास ने अरविंद घोष की पैरवी की. उन्होंने अदालत में तर्क दिया कि केवल वैचारिक लेखन या राष्ट्रवादी विचार किसी व्यक्ति को अपराधी सिद्ध नहीं करते.
लगभग एक वर्ष तक चले मुकदमे के बाद अरविंद घोष बरी हो गए, जबकि कुछ अन्य आरोपियों को सजा मिली. यह मुकदमा भारतीय कानूनी इतिहास के सबसे चर्चित मामलों में गिना जाता है.
1922 में महात्मा गांधी पर 'यंग इंडिया' में प्रकाशित लेखों के आधार पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया. अहमदाबाद की अदालत में गांधी ने अपने बयान में आरोपों से इनकार नहीं किया. उन्होंने कहा कि यदि अन्यायपूर्ण कानून का विरोध करना अपराध है, तो वे उस अपराध को स्वीकार करते हैं. उन्होंने अदालत से दया नहीं मांगी, बल्कि अधिकतम सजा देने की बात कही.
जज सी. एन. ब्रूमफील्ड ने गांधी को छह वर्ष की सजा सुनाई. हालांकि स्वास्थ्य कारणों से वे लगभग दो वर्ष बाद रिहा हो गए. यह मुकदमा इसलिए ऐतिहासिक माना जाता है क्योंकि गांधी ने अदालत को अपने राजनीतिक और नैतिक विचार रखने का मंच बना दिया.
9 अगस्त 1925 को क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन से धन लूटकर ब्रिटिश शासन को सीधी चुनौती दी. इसके बाद चले मुकदमे में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह सहित कई क्रांतिकारियों पर आरोप लगाए गए.
मुकदमा लंबा चला और अंततः चार क्रांतिकारियों को फांसी तथा अन्य साथियों को आजीवन कारावास सहित विभिन्न सजाएं सुनाई गईं. यह मुकदमा दिखाता है कि ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारी गतिविधियों को केवल अपराध नहीं, बल्कि अपने शासन के लिए राजनीतिक खतरा मानती थी.
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे चर्चित मुकदमों में से एक था लाहौर षड्यंत्र केस. भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु पर पुलिस अधिकारी जे. पी. सॉन्डर्स की हत्या तथा क्रांतिकारी गतिविधियों के आरोप लगाए गए.
इस मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि भगत सिंह और उनके साथियों ने अदालत को केवल बचाव का मंच नहीं माना. उन्होंने वहां से औपनिवेशिक शासन, राजनीतिक कैदियों के अधिकार और स्वतंत्रता की आवश्यकता पर अपने विचार रखे.
जेल में लंबी भूख हड़ताल ने इस मुकदमे को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक चर्चा का विषय बना दिया. 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई, लेकिन यह मुकदमा लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया.
यह मुकदमा क्रांतिकारियों का नहीं, बल्कि मजदूर आंदोलन और ट्रेड यूनियन नेताओं से जुड़ा था. ब्रिटिश सरकार ने कई ट्रेड यूनियन नेताओं पर आरोप लगाया कि वे सरकार के खिलाफ साजिश कर रहे हैं.
चार वर्षों तक चले इस मुकदमे ने मजदूर अधिकारों, राजनीतिक स्वतंत्रता और औपनिवेशिक कानूनों पर व्यापक बहस छेड़ दी. इतिहासकार मानते हैं कि इस मुकदमे ने भारतीय श्रमिक आंदोलन को राष्ट्रीय राजनीति से और अधिक जोड़ दिया.
यदि किसी मुकदमे ने पूरे देश को एकजुट किया, तो वह था लाल किले में चला आज़ाद हिंद फौज (INA) ट्रायल. शाहनवाज़ खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा चलाया.
उनकी ओर से भारत के कई प्रतिष्ठित वकीलों ने पैरवी की. अदालत के बाहर देशभर में व्यापक जनसमर्थन देखने को मिला. हालांकि यह मुकदमा कानूनी था, लेकिन इसका सबसे बड़ा असर राजनीतिक रहा. इतिहासकार मानते हैं कि इसने भारतीय सेना और जनता के भीतर ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष को और गहरा किया.
ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य मुकदमों के जरिए आंदोलन को कमजोर करना था, लेकिन कई भारतीय नेताओं ने इन्हीं अदालतों को जनता तक अपनी बात पहुंचाने का माध्यम बना लिया.
यानी अदालतें केवल न्याय का स्थान नहीं रहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का सार्वजनिक मंच भी बन गईं.