जब कोई इंसान लाइलाज बीमारी के असहनीय दर्द में तड़पता है, तो परिवार और समाज दोनों यही दुआ करते हैं कि भगवान उसे जल्दी मुक्ति दे दें. इसी भावना से इच्छामृत्यु का विचार सामने आया. भारत में यह मुद्दा लंबे समय से बहस का विषय रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसलों से निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कुछ शर्तों के साथ जगह दी है. हाल ही में हरीश राणा के मामले में कोर्ट ने फिर से इस पर विचार शुरू किया है. यह कानून उन मरीजों के लिए है जो सालों से कोमा में हैं या जिनकी जिंदगी सिर्फ मशीनों पर टिकी है.
इच्छामृत्यु दो तरह की होती है- सक्रिय और निष्क्रिय. सक्रिय में दवा देकर मौत दी जाती है, जो भारत में पूरी तरह गैरकानूनी है. निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवन रक्षक उपकरण हटाए जाते हैं, जिससे मरीज प्राकृतिक मौत की ओर बढ़ता है. भारत में केवल यही रूप कुछ मामलों में वैध माना गया है. यह फैसला मरीज की गरिमा और दर्द से मुक्ति पर आधारित है.
1973 में मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग पर क्रूर हमला हुआ था, जिसके बाद वे 42 साल तक कोमा में रहीं. 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दोस्त पिंकी विरानी की याचिका पर फैसला दिया. कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मंजूरी दी, लेकिन सख्त शर्तों के साथ. लाइफ सपोर्ट हटाने की इजाजत मिली, पर कोर्ट की निगरानी जरूरी थी. यह भारत में इच्छामृत्यु की कानूनी शुरुआत मानी जाती है.
2006 में विधि आयोग ने अपनी 196वीं रिपोर्ट में इच्छामृत्यु पर विचार रखा. 2012 में 241वीं रिपोर्ट में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए मजबूत सिफारिश की गई. रिपोर्ट में मरीज, परिवार और डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए साफ नियम बनाने पर जोर दिया गया. इन रिपोर्टों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को मजबूत आधार दिया और कानूनी बहस को नई दिशा दी.
मार्च 2018 में कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध ठहराया. कोर्ट ने 'लिविंग विल' को मान्यता दी, जिसमें व्यक्ति पहले से लिखित रूप में बता सकता है कि गंभीर हालत में उसका जीवन रक्षक उपकरण(वेंनिलेटर) हटाया जाए. कोर्ट ने दुरुपयोग रोकने के लिए विस्तृत दिशा निर्देश भी जारी किए, जिसमें मेडिकल बोर्ड और परिवार की सहमति जरूरी है.
31 साल के हरीश राणा 13 साल से कोमा में हैं. उनके माता-पिता निष्क्रिय इच्छामृत्यु की मांग कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने AIIMS की रिपोर्ट देखी, जिसमें ठीक होने की उम्मीद न के बराबर बताई गई है. कोर्ट ने माता-पिता से व्यक्तिगत बातचीत का फैसला लिया है. यह मामला इच्छामृत्यु कानून की व्यावहारिक चुनौतियों को फिर से सामने ला रहा है.