नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली और इसके आसपास के इलाके ही नहीं, बल्कि देश भर के कई शहरों व ग्रामीण क्षेत्रों में वायु प्रदूषण की समस्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है. सरकारें इसको लेकर कई योजनाओं को अमल में लाने के वादे तो करती है, लेकिन उन वादों को अमलीजामा न पहनाने से ये समस्या समय के साथ और अधिक विकराल होती जा रही है. इस साल जिस हिसाब से दिल्ली-एनसीआर सहित देश के कई अन्य हिस्सों में लोगों को जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा है, उसको देखते हुए ये कयास लगाए जा रहे थे कि बजट में इससे निपटने को लेकर बड़े और प्रभावी ऐलान किये जा सकते हैं, लेकिन लोगों की इन उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा है.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए साल 2026-27 के बजट में प्रदूषण जैसे अदृश्य दैत्य से निपटने के लिए महज 1091 करोड़ रूपये आवंटित किये गए हैं. इस मामूली बजट से देश भर में तेजी से पांव पसार रहे वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने जैसी पहल को शुरुआती स्तर पर ही बड़ा झटका लगता नजर आ रहा है. सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़े दर्शाते हैं कि साफ हवा के लक्ष्यों और वास्तविक फंडिंग के बीच एक गहरी खाई है. पर्यावरण विशेषज्ञों ने इसे बिगड़ती स्वास्थ्य स्थितियों और चरम मौसम की घटनाओं की अनदेखी करार दिया है.
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के लिए सरकार ने 3,759.46 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है. यह राशि 2025-26 के मुकाबले करीब 8 प्रतिशत अधिक है, लेकिन एक्सपर्ट्स इसे पर्याप्त नहीं मान रहे. उनका कहना है कि भारत की जलवायु संवेदनशीलता और पारिस्थितिक गिरावट को देखते हुए यह वृद्धि केवल मामूली फेरबदल जैसा है. हीटवेव, बाढ़ और चक्रवातों के बढ़ते खतरे को देखते हुए यह फंड अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए शमन और अनुकूलन के वादों के मुकाबले बहुत कम है.
इस बार पूंजीगत व्यय में सुधार करते हुए इसे 222.80 करोड़ रुपये किया गया है, जिसका लक्ष्य पर्यावरण निगरानी और रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना है. सरकार का फोकस नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया जैसे रेगुलेटरी संस्थानों को चलाने पर अधिक है. हालांकि, राजस्व खर्च में केवल मामूली बढ़त हुई है, जो मुख्य रूप से पुरानी योजनाओं को बनाए रखने तक सीमित है. बढ़ते मुकदमों और प्रवर्तन की आवश्यकताओं को देखते हुए यह निवेश बड़े बदलाव के बजाय यथास्थिति बनाए रखने जैसा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि भूमि बहाली, वन विस्तार और जल गुणवत्ता सुधार जैसे भारत के बड़े लक्ष्यों के लिए मज़बूत वित्तपोषण अनिवार्य है. वर्तमान में साफ़ हवा की प्राथमिकता को लेकर सरकार के दावे और बजटीय आंकड़े मेल नहीं खाते. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और क्लीन एयर प्रोग्राम के लिए संसाधनों को कम करना खतरनाक हो सकता है. यह मामूली बढ़ोतरी असल में पिछले वर्षों के स्थगित खर्चों को ही बहाल करती है, जिससे जलवायु लचीलापन बनाने की दिशा में कोई नई गति नहीं मिल पा रही है.