दिल्ली हाईकोर्ट ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा को झटका देते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी है. बोरा ने विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SEM) की ओर से जारी उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का निजी मुचलका और एक जमानतदार पेश करने को कहा गया था.
हालांकि, अदालत ने निर्देश दिया कि कार्यवाही में जिन दस्तावेजों और तथ्यों पर भरोसा किया जा रहा है, वे सभी बोरा को उपलब्ध कराए जाएं. कोर्ट ने मजिस्ट्रेट से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 135 के दायरे और प्रभाव पर भी विचार करने को कहा. इसमें यह सवाल शामिल है कि जांच की शुरुआत में ही मुचलका मांगना उचित है या आगे की परिस्थितियों और शांति भंग होने के संभावित खतरे को देखते हुए इस पर निर्णय लिया जाना चाहिए. विस्तृत फैसला आना अभी बाकी है.
यह मामला 16 अक्टूबर को दिल्ली में आयोजित ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च से जुड़ा है. इस प्रदर्शन में कथित तौर पर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में अनियमितताओं के विरोध में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की गई थी. मार्च में शामिल होने के बाद बोरा को एहतियातन हिरासत में लिया गया था. इसके अगले दिन, 17 अक्टूबर को बीएनएसएस की धारा 126 के तहत नोटिस जारी किया गया. उन्हें 19 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट के सामने पेश होकर मुचलका देने के संबंध में अपना पक्ष रखने को कहा गया था.
बोरा की ओर से वकील अभिक चिमनी द्वारा तैयार याचिका में कहा गया कि नोटिस अस्पष्ट और तथ्यात्मक रूप से गलत था. याचिका के मुताबिक, इसमें ऐसा कोई ठोस आधार नहीं दिया गया जिससे साबित हो कि बोरा से शांति भंग होने की आशंका है. दिल्ली पुलिस ने याचिका की सुनवाई योग्य होने पर सवाल उठाया. पुलिस के अनुसार, बोरा ने 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में नारे लगाए, निषेधाज्ञा के बावजूद जंतर-मंतर के आसपास बार-बार प्रदर्शन किया और लोगों को इसमें शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया. उस क्षेत्र में बीएनएसएस की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लागू होने की बात कही गई.
सुनवाई के दौरान बोरा के वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए नागरिकों को अनुमति की जरूरत नहीं है और लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की मांग करना गलत नहीं है. इसके जवाब में पुलिस ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार बदली जानी चाहिए तो इसका रास्ता चुनाव है, न कि राजधानी में जुटने वाले उपद्रवी तत्व. अदालत के विस्तृत फैसले और मजिस्ट्रेट को दिए गए निर्देशों के कारणों का इंतजार है.