अरुणाचल प्रदेश में भारत और चीन के सैनिकों के बीच जारी तनाव को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है. भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर के बयान के बाद कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं. विपक्ष का आरोप है कि सरकार सीमा पर चीन की गतिविधियों को लेकर चुप्पी साधे हुए है, जबकि सैनिकों के आमने-सामने आने की स्थिति लगातार बनी हुई है.
ITBP प्रमुख शत्रुजीत कपूर ने गुरुवार को राजस्थान के अलवर स्थित सेंट्रल ट्रेनिंग कॉलेज में आयोजित 'हिमवीर सम्मान समारोह' के दौरान कहा कि पिछले कुछ दिनों में अरुणाचल प्रदेश के कई स्थानों पर भारत और चीन के सैनिक आमने-सामने आ गए थे. उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति अभी तक जारी है.
#ITBP DG’s first official confirmation of ongoing face-offs at multiple locations in #ArunachalPradesh. The DG praised the courage and operational role of ITBP’s Shaurya Commando platoons amid the face-offs, underscoring the force’s focus on strengthening its preparedness along the #China border.
— Shivani Sharma (@shivanipost) October 23, 2026
इस साल जुलाई में पूर्वोत्तर सीमा पर तनाव शुरू होने के बाद इसे लेकर आधिकारिक स्तर पर आया यह पहला ऐसा बयान बताया जा रहा है, जिसमें मौजूदा स्थिति की स्पष्ट पुष्टि की गई है. कपूर के मुताबिक, सीमा पर जारी टकराव के दौरान ITBP के कमांडो सक्रिय रहे और उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
उन्होंने बताया कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आने के दौरान भी सीमा पर झड़पें जारी थीं. कपूर ने नवगठित शौर्य कमांडो टीमों के काम की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में असाधारण प्रदर्शन किया.
ITBP प्रमुख ने सीमा सुरक्षा से जुड़े संसाधनों पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि बल जिन हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है, उनमें से कई करीब 50 साल पुराने हैं. ऐसे में हथियारों और तकनीक का आधुनिकीकरण जरूरी है.
कपूर ने ड्रोन और ड्रोन-रोधी तकनीक में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया. उनका कहना था कि चीन ने अपने सुरक्षा बलों, हथियारों और बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने में भारी निवेश किया है. इसलिए केवल पारंपरिक तरीकों से उसका मुकाबला करना मुश्किल हो सकता है.
In another statement, the ITBP DG says it is tough to combat the Chinese PLA because they have been heavily modernised and traditional methods are no longer sufficient. This is the condition of our defence forces after 12 years under @narendramodi and the BJP. Where is all our money going? Our forces are struggling at the borders while taxpayers’ money is being given to corrupt contractors who build infrastructure that cannot even last a year.
— Saral Patel (@SaralPatel) October 23, 2026
उन्होंने रूस-यूक्रेन और ईरान-अमेरिका संघर्षों का उदाहरण देते हुए कहा कि ड्रोन जैसी तकनीक छोटे देशों को भी बड़ी सैन्य शक्तियों से मुकाबला करने में मदद कर सकती है. रूस-यूक्रेन युद्ध में सैनिकों के बड़े पैमाने पर हताहत होने का जिक्र करते हुए उन्होंने आधुनिक युद्ध तकनीक के महत्व को रेखांकित किया.
ITBP का गठन पहाड़ी क्षेत्रों में गुरिल्ला बल के रूप में हुआ था. कपूर ने बताया कि वर्ष 2004 में बल को चीन से लगी सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. वह 31 अक्टूबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं.
ITBP प्रमुख के बयान के बाद कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर निशाना साधा. पार्टी का आरोप है कि जुलाई से चीनी सैनिकों के साथ टकराव की खबरें सामने आ रही थीं, लेकिन सरकार ने इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से पर्याप्त महत्व नहीं दिया.
कांग्रेस ने एक्स पर कहा कि सीमा पर तनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी BRICS सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का स्वागत करते और उनके साथ बातचीत करते दिखाई दिए. पार्टी ने इसे भारतीय सैनिकों के बलिदान और संघर्ष के प्रति असंवेदनशील रवैया बताया.
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने भी सरकार पर चीन के सामने झुकने का आरोप लगाया. उनका कहना है कि सीमा पर गंभीर स्थिति के बावजूद सरकार की ओर से स्पष्ट जवाब नहीं दिया जा रहा है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने एक्स पर लिखे अपने बयान में कहा कि ITBP महानिदेशक ने अरुणाचल प्रदेश में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के साथ हालिया टकराव के दौरान भारतीय बलों के प्रदर्शन की सराहना की है. हालांकि, उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री और सरकार का पूरा तंत्र इस गंभीर मामले पर चुप है.
रमेश ने दावा किया कि ताकसिंग में टकराव के बाद पिछले महीने अरुणाचल प्रदेश के वाचा और दमाई में कोर कमांडर स्तर की बातचीत हुई थी. उन्होंने स्थानीय लोगों के हवाले से यह भी कहा कि लद्दाख की तरह अरुणाचल प्रदेश में भी गश्त के कुछ स्थानों तक भारत की पहुंच प्रभावित हुई है. ये विपक्ष के आरोप और दावे हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है.
कांग्रेस नेता ने चीन की ओर से अरुणाचल प्रदेश के भारतीय स्थानों के नाम बदलने और वहां 60,000 मेगावाट क्षमता वाली बांध परियोजना बनाने की योजना का भी मुद्दा उठाया. उन्होंने इसे भारत की पारिस्थितिकी और जल सुरक्षा के लिए संभावित खतरा बताया.
जयराम रमेश ने 19 जून 2020 को चीन के साथ सीमा पर तनाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी के उस बयान का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारतीय सीमा में कोई घुसा नहीं है और न ही किसी भारतीय चौकी पर दूसरे पक्ष का कब्जा है. कांग्रेस इस बयान को चीन को दी गई विवादित 'क्लीन चिट' बताती रही है.
रमेश ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे के उस कथित अनुभव का भी हवाला दिया, जिसमें लद्दाख में चीनी घुसपैठ के दौरान उन्हें निर्देश मिला था कि वह स्थिति के अनुसार कार्रवाई करें. इसके अलावा, उन्होंने 4 जुलाई 2025 को उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राहुल सिंह के उस बयान का जिक्र किया, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के सैन्य अभियान में चीन की भूमिका का उल्लेख किया गया था.
कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि 25 अगस्त 2026 को पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने राहुल सिंह के खुलासों का सार्वजनिक रूप से खंडन किया था. रमेश ने इसके बाद चौहान की एक प्रमुख RSS-BJP समर्थित थिंक टैंक में नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठाए.
कांग्रेस का कहना है कि सीमा पर तनाव, चीन के साथ बढ़ते आर्थिक संबंधों और सैन्य अधिकारियों के बयानों में कथित विरोधाभासों को देखते हुए सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए.
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी ITBP प्रमुख के बयान को लेकर केंद्र सरकार पर तंज कसा. उन्होंने एक्स पर लिखा कि जिन सुरक्षा बलों को सीमाओं की रक्षा करनी चाहिए, उनका इस्तेमाल देश के भीतर विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए किया जा रहा है.
दीपके ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती और दिल्ली को किले में बदलने जैसी व्यवस्थाएं राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकताओं से ध्यान भटकाती हैं. उनके अनुसार, सरकार को सबसे पहले सीमाओं की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए.
एक्टिविस्ट गुरमेहर कौर ने भी चीन की सैन्य क्षमता को लेकर चिंता जताई. उन्होंने ITBP प्रमुख के बयान के संदर्भ में सरकार के पुराने दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि सीमा विवाद, कथित गश्त संबंधी बाधाएं और चीन के साथ व्यापार घाटा गंभीर मुद्दे हैं.
कौर ने यह भी आरोप लगाया कि ऑपरेशन सिंदूर को लेकर शीर्ष सैन्य अधिकारियों के बयानों में विरोधाभास दिखाई देता है. उनके ये बयान सरकार की चीन नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी दावों की आलोचना का हिस्सा हैं.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई के आखिरी दिनों से अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले में ताकसिंग के पास असाफिला क्षेत्र में भारत और चीन के बीच गतिरोध बना हुआ है. रिपोर्ट में कहा गया है कि चीनी PLA ने ऊंचाई वाले इलाके में तंबू लगाए हैं.
ये तंबू माजा कंपनी के ऑपरेटिंग बेस के पास स्थित हैं. भारत की वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) संबंधी धारणा के मुताबिक, यह स्थान सीमा से लगभग 6 से 7 किलोमीटर के भीतर बताया गया है. असाफिला और माजा इलाके में तनाव की खबरों ने सीमा पर निगरानी और गश्त को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं.
भारत ने 11 से 13 सितंबर तक BRICS शिखर सम्मेलन के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मेजबानी की थी. इस दौरान दोनों देशों ने संबंधों में तनाव कम करने की बात कही थी. हालांकि, सीमा पर जारी घटनाक्रम के बाद दोनों देशों के बीच वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद दशकों पुराना है. चीन अरुणाचल प्रदेश को 'दक्षिणी तिब्बत' बताता है और इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है. भारत इन दावों को खारिज करता है और अरुणाचल प्रदेश को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अरुणाचल प्रदेश को भारत के हिस्से के रूप में व्यापक मान्यता प्राप्त है.
दोनों देशों के बीच सीमा की लंबाई लगभग 3,500 किलोमीटर मानी जाती है. सीमा विवाद के कारण दोनों देश 1962 में युद्ध लड़ चुके हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में सीमा का निर्धारण अब भी विवादित है. इसी वजह से समय-समय पर दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने आ जाते हैं.
चीन का दावा पहले अरुणाचल प्रदेश के उत्तरी हिस्से, विशेषकर तवांग, पर अधिक केंद्रित रहा है. तवांग धार्मिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है. यहां एक प्रसिद्ध और विशाल बौद्ध मठ भी स्थित है.
भारत और चीन के बीच सीमा निर्धारण को लेकर मैकमोहन रेखा महत्वपूर्ण है. भारत इसे अपनी पूर्वी सीमा का आधार मानता है, जबकि चीन इस रेखा को स्वीकार नहीं करता. चीन का दावा है कि अरुणाचल प्रदेश के करीब 90,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर उसका अधिकार होना चाहिए.
सीमा विवाद केवल अरुणाचल प्रदेश तक सीमित नहीं है. पश्चिमी क्षेत्र में लद्दाख से जुड़ा अक्साई चिन भी दोनों देशों के बीच विवाद का प्रमुख केंद्र है. भारत का आरोप है कि चीन ने अक्साई चिन के बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा कर रखा है.
1950 के दशक के आखिर में तिब्बत पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद चीन ने अक्साई चिन के लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अपना अधिकार मजबूत किया. इस इलाके से चीन ने राष्ट्रीय राजमार्ग 219 बनाया, जो शिनजियांग को तिब्बत से जोड़ता है. भारत इस क्षेत्र पर चीन के नियंत्रण को अवैध कब्जा मानता है.
अरुणाचल प्रदेश में सैनिकों के आमने-सामने आने और ITBP प्रमुख के बयान के बाद सीमा विवाद एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है. जहां विपक्ष सरकार से चीन के साथ सीमा पर जारी तनाव की स्थिति स्पष्ट करने की मांग कर रहा है, वहीं वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हालात और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक प्रयासों पर सबकी नजर बनी हुई है.