मुंबई: बॉलीवुड में जब किसी फिल्म का पहला भाग जबरदस्त हिट हो जाता है, तो उसके सीक्वल से उम्मीदें अपने आप बढ़ जाती हैं. कुछ ऐसा ही हाल धुरंधर 2 द रिवेंज के साथ भी देखने को मिला. यह फिल्म सिर्फ एक सीक्वल नहीं बल्कि एक बड़े सिनेमाई सफर का अगला अध्याय है, जिसे डायरेक्टर आदित्य धर ने काफी बड़े स्तर पर पेश किया है. धुरंधर 2 द रिवेंज वहीं से शुरू होती है जहां पहली फिल्म खत्म हुई थी. कहानी हमजा अली मजारी यानी जसकीरत सिंह रंगी के इर्द गिर्द घूमती है, जो अब अपने मिशन में पूरी तरह डूब चुका है.
एक निजी दर्द और अतीत के जख्म उसे उस रास्ते पर ले जाते हैं जहां वह दुश्मनों के बीच रहकर उन्हें खत्म करने की कोशिश करता है. पाकिस्तान के अंडरवर्ल्ड में अपनी पहचान बनाते हुए वह धीरे धीरे सबसे बड़ा नाम बनने की ओर बढ़ता है. लेकिन यह सफर आसान नहीं है. हर कदम पर उसे अपनी पहचान, रिश्ते और जिंदगी को दांव पर लगाना पड़ता है.
मेकर्स ने इस कहानी को दो भागों में बांटने का फैसला किया, जो काफी हद तक सही भी लगता है. क्योंकि कहानी का दायरा इतना बड़ा है कि इसे एक फिल्म में समेटना मुश्किल था. हालांकि, इस पार्ट में कहानी का प्रवाह थोड़ा कमजोर महसूस होता है. जहां पहली फिल्म में हर चीज बहुत बारीकी से दिखाई गई थी, वहीं इस बार डिटेलिंग थोड़ी कम नजर आती है.
फिल्म का पहला हिस्सा तेज जरूर है, लेकिन उसमें वह गहराई नहीं दिखती जो दर्शकों को पूरी तरह बांध सके. कई जगह कहानी सुविधाजनक लगती है और कुछ सीन आपको फिल्म से बाहर निकाल देते हैं. यही वजह है कि शुरुआत में फिल्म उतनी असरदार नहीं लगती जितनी उम्मीद की जा रही थी.
फिल्म का असली जादू इंटरवल के बाद शुरू होता है. दूसरा हाफ ज्यादा मजबूत और दिलचस्प है. कहानी एक सही दिशा में आगे बढ़ती है और क्लाइमैक्स तक पहुंचते पहुंचते पूरी तरह पकड़ बना लेती है. इंटरवल पॉइंट खुद में काफी दमदार है, जो दर्शकों को बांधे रखता है. अगर इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत की बात करें तो वह हैं रणवीर सिंह. उन्होंने जसकीरत और हमजा दोनों किरदारों को इतनी आसानी से निभाया है कि आप उनके साथ जुड़ जाते हैं. उनके चेहरे पर दिखने वाला दर्द और अंदर की कशमकश इस किरदार को और मजबूत बनाती है. पूरी फिल्म उनके कंधों पर टिकी हुई नजर आती है और वह इसे पूरी तरह संभाल लेते हैं.
आर माधवन को इस बार ज्यादा स्क्रीन टाइम मिला है और वह अपनी छाप छोड़ने में सफल रहते हैं. संजय दत्त और राकेश बेदी भी अपने किरदारों में प्रभावी हैं. अर्जुन रामपाल का विलेन अवतार इस बार उतना खतरनाक नहीं लगता जितना पहली फिल्म में था. वहीं सारा अर्जुन सीमित स्क्रीन टाइम में भी अच्छा काम करती हैं.
फिल्म का म्यूजिक इस बार उतना खास नहीं है जितना पहले पार्ट में था. हालांकि बैकग्राउंड स्कोर खासकर क्लाइमैक्स में फिल्म को मजबूत बनाता है. डायरेक्टर आदित्य धर ने इस बार ज्यादा फ्लैशबैक या पुराने सीन पर निर्भर नहीं किया, जो फिल्म के लिए अच्छा फैसला साबित होता है.