मुंबई: 27 जनवरी को जन्मदिन मना रहे बॉबी देओल का करियर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रहा. 90 के दशक में रोमांटिक हीरो बनकर छाने वाले बॉबी ने शोहरत की ऊंचाइयां देखीं, फिर एक लंबा सन्नाटा भी झेला. लेकिन हार मानने के बजाय उन्होंने खुद को बदला. ओटीटी और सशक्त किरदारों के जरिए उन्होंने साबित किया कि उम्र या असफलता प्रतिभा को खत्म नहीं कर सकती.
1969 में जन्मे विजय सिंह देओल, यानी बॉबी देओल, फिल्मी परिवार से आते हैं. धर्मेंद्र के छोटे बेटे और सनी देओल के भाई होने के बावजूद बॉबी ने अपनी अलग राह बनाई. मायो कॉलेज, अजमेर और बाद में मुंबई के मीठीबाई कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उन्होंने ग्लैमर से पहले जीवन को समझा, जिसने आगे चलकर उनके अभिनय को गहराई दी.
1995 में आई फिल्म बरसात ने बॉबी देओल को सीधे स्टार बना दिया. मासूम चेहरा, भावुक अभिनय और युवा ऊर्जा ने उन्हें लड़कियों का चहेता बना दिया. इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट डेब्यू अवॉर्ड मिला. 90 के दशक में बॉबी एक ऐसे रोमांटिक हीरो बनकर उभरे, जिनमें सादगी और संवेदनशीलता दोनों थीं.
गुप्त, सोल्जर, अजनबी, हमराज और बादल जैसी फिल्मों में बॉबी देओल ने अपने अभिनय का दायरा बढ़ाया. कभी रहस्यमय तो कभी ग्रे शेड्स वाले किरदारों में वे सहज दिखे. यह दौर बॉक्स ऑफिस पर उनकी मजबूती का प्रतीक था, जहां वे भरोसेमंद अभिनेता माने जाते थे.
2000 के दशक के मध्य में बॉबी देओल का करियर धीमा पड़ गया. फिल्में नहीं चलीं, ऑफर कम होते गए और एक लंबा ब्रेक आ गया. इस दौर में उन्होंने मानसिक संघर्ष झेला, जिसे बाद में उन्होंने खुले तौर पर स्वीकार किया. यह समय उनके लिए आत्ममंथन का था, जहां चमक कम हुई लेकिन समझ बढ़ी.
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बॉबी देओल को दूसरा मौका दिया. क्लास ऑफ ’83 और खासतौर पर आश्रम में बाबा निराला का किरदार उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बना. निडर, अंधेरे और प्रभावशाली रोल में बॉबी ने दिखाया कि अभिनय उम्र का मोहताज नहीं. इसके बाद एनिमल में उनका खामोश लेकिन खौफनाक किरदार उनकी वापसी की मुहर बन गया.