भारत में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जो अपनी अनोखी परंपराओं और रहस्यमयी मान्यताओं के कारण लोगों को आकर्षित करते हैं. उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले का एक ऐसा ही मंदिर इन दिनों अपनी अनोखी विशेषता की वजह से चर्चा में है. बेहटा गांव में स्थित जगन्नाथ मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों का दावा है कि यहां मानसून आने से लगभग सात दिन पहले ही मंदिर की छत से पानी की बूंदें टपकने लगती हैं. यही कारण है कि यह मंदिर वर्षों से श्रद्धालुओं और किसानों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है.
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, भीषण गर्मी के बीच मानसून आने से करीब एक सप्ताह पहले मंदिर की छत से अपने आप पानी टपकना शुरू हो जाता है. लोगों का विश्वास है कि बूंदों के आकार और मात्रा के आधार पर अच्छी, सामान्य या कम बारिश का अनुमान लगाया जाता है. इसी वजह से आसपास के किसान भी इस संकेत को खास महत्व देते हैं.
मंदिर की इस अनोखी घटना को समझने के लिए कई बार वैज्ञानिकों ने अध्ययन और सर्वेक्षण किए हैं. हालांकि अब तक इसके पीछे की वास्तविक वजह स्पष्ट नहीं हो सकी है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वैज्ञानिक केवल इतना पता लगा सके कि मंदिर का अंतिम जीर्णोद्धार लगभग 11वीं सदी में हुआ था.
इस ऐतिहासिक मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की काले रंग की प्रतिमाएं स्थापित हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि मानसून से पहले छत का भीगना और बारिश शुरू होने के बाद मंदिर के भीतर पानी की एक भी बूंद न गिरना इसकी सबसे अनोखी विशेषताओं में शामिल है.
जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर इस मंदिर में भी हर वर्ष भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है. इस आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं. धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ यह मंदिर अपनी रहस्यमयी पहचान के कारण भी दूर-दूर से लोगों को आकर्षित करता है.
ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर की छत से टपकने वाली बूंदें खेती के मौसम का संकेत मानी जाती हैं. उनके अनुसार, बूंदों की स्थिति देखकर वर्षा का अनुमान लगाया जाता है. सबसे दिलचस्प बात यह मानी जाती है कि जैसे ही मानसून की पहली बारिश शुरू होती है, मंदिर की छत पूरी तरह सूख जाती है. इसी वजह से यह मंदिर आज भी लोगों की आस्था और जिज्ञासा का विषय बना हुआ है.