नई दिल्ली: देश की संसद में एक ऐसा बिल पास हुआ है जो आम नागरिकों की रोजमर्रा की छोटी-मोटी गलतियों को अपराध की सूची से हटाने जा रहा है. जन विश्वास बिल के तहत अब ड्राइविंग लाइसेंस रिन्यू कराने में थोड़ी देरी या राजमार्ग पर यातायात प्रभावित करने जैसी बातों पर जेल की सजा नहीं होगी. वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इसे ‘राम राज्य’ की अवधारणा से जोड़ते हुए कहा कि इससे लोगों का जीवन आसान बनेगा और अनावश्यक मुकदमों से मुक्ति मिलेगी. बिल पास होते ही कई पुराने कड़े प्रावधानों में नरमी आ गई है.
ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता खत्म होने के बाद 30 दिन तक इसे वैलिड माना जाएगा. पहले रिन्यूअल में देरी होने पर अपराध बन जाता था, लेकिन अब ऐसी मामूली देरी पर कोई सजा नहीं होगी. रिन्यूअल की तारीख से नई वैधता शुरू होगी, न कि पुरानी समाप्ति तारीख से. इससे लाखों वाहन चालकों को राहत मिलेगी जो छोटी भूल के कारण परेशान रहते थे.
राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत राजमार्ग को जाम करने या यातायात असुरक्षित बनाने पर पहले पांच साल तक जेल या जुर्माने की सजा थी. जन विश्वास बिल में जेल का प्रावधान हटा दिया गया है. अब केवल नागरिक दंड यानी जुर्माना ही लगेगा. इससे प्रदर्शनकारी या आम लोग भी अनावश्यक कानूनी झंझट से बच सकेंगे.
आग लगने का झूठा अलार्म देना पहले दंडनीय अपराध था, लेकिन अब इसे पूरी तरह अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है. इससे फायर ब्रिगेड की अनावश्यक व्यस्तता कम होगी और संसाधनों का सही उपयोग हो सकेगा. बिल के इस बदलाव से प्रशासनिक बोझ भी हल्का पड़ेगा.
दिल्ली नगर निगम अधिनियम समेत कई कानूनों में जन्म और मृत्यु की सूचना न देने को अपराध माना जाता था. जन विश्वास बिल के बाद यह भी अपराध की सूची से हट गया है. साथ ही कॉपीराइट रजिस्टर में गलत एंट्री जैसी तकनीकी गलतियों पर भी अब सजा नहीं होगी. आम परिवारों को यह सुविधा बड़ी राहत देगी.
कैटल ट्रेसपास एक्ट, 1971 में आवारा पशुओं से फसल को नुकसान पहुंचाने पर पहले सजा का प्रावधान था. अब इसे जुर्माने में बदल दिया गया है. पशु छोड़ने या आवारा घुमाने पर भी केवल monetary penalty लगेगी. किसानों और पशुपालकों दोनों को संतुलित राहत मिलेगी.
बिजली अधिनियम के तहत विभागीय निर्देश न मानने पर पहले जेल हो सकती थी, अब केवल जुर्माना रहेगा. इसी तरह ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत नियम तोड़कर कॉस्मेटिक्स बनाने या बेचने पर जेल की जगह सिर्फ जुर्माना होगा. अप्रेंटिस एक्ट में पहली बार गलती पर सिर्फ सलाह या चेतावनी दी जाएगी.
बिल में स्पष्ट प्रावधान है कि जुर्माने की राशि अपराध की गंभीरता को देखते हुए तय की जाएगी. साथ ही हर तीन साल में न्यूनतम जुर्माने में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी स्वतः होगी. इससे दंड व्यवस्था अनुपातिक और समयानुसार बनी रहेगी. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे छोटे उद्यमियों और आम नागरिकों का विश्वास बढ़ेगा और अनावश्यक मुकदमेबाजी कम होगी. कुल मिलाकर यह बिल विश्वास आधारित शासन की नई मिसाल पेश कर रहा है.