8th Pay Commission: सरकारी नौकरी करने वाले हर परिवार के मन में इन दिनों बस एक ही सवाल घूम रहा है, आखिर अगली सैलरी कितनी बढ़ेगी. 8वां वेतन आयोग जैसे-जैसे करीब आता जा रहा है, कर्मचारी संगठनों की मांगों ने हलचल मचा दी है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अलग-अलग संगठनों की मांग में हजारों रुपये का फासला है, जिससे तय करना मुश्किल है कि किस आंकड़े पर मुहर लगेगी, लेकिन आंकड़े देखकर अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है.
फिटमेंट फैक्टर असल में वह गुणांक है, जिससे मौजूदा बेसिक सैलरी को गुणा करके नई बेसिक सैलरी तय होती है. इसमें महंगाई भत्ते का असर पहले से जुड़ा रहता है, ताकि बढ़ती कीमतों की भरपाई हो सके और असली कमाई में भी इजाफा हो. पिछली बार 7वें वेतन आयोग में 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू हुआ था, जिससे न्यूनतम बेसिक पे ₹7,000 से बढ़कर ₹18,000 हो गई थी.
सबसे ज्यादा चर्चा में है भारतीय प्रतिरक्षा मजदूर संघ यानी बीपीएमएस की मांग, जिसने 4.00 का फिटमेंट फैक्टर मांगा है. इस हिसाब से ₹18,000 वाला बेसिक पे बढ़कर ₹72,000 तक पहुंच सकता है. संगठन ने 2016-17 से 2024-25 के बीच प्रति व्यक्ति आय में हुई बढ़ोतरी और पांच सदस्यों वाले परिवार के खर्च का हवाला देकर यह आंकड़ा तैयार किया है, हालांकि सरकारी खजाने का बोझ देखते हुए इसे संतुलित भी रखा गया है.
इसके उलट नेशनल काउंसिल जेसीएम स्टाफ साइड और भारत पेंशनर्स समाज ने 3.833 का फिटमेंट फैक्टर मांगा है, जिससे न्यूनतम बेसिक पे लगभग ₹69,000 बनती है. इस आंकड़े के पीछे परिवार के खाने, कपड़े, मकान, ईंधन और शिक्षा जैसे खर्चों का पूरा हिसाब जोड़ा गया है. वहीं मिनिस्टीरियल स्टाफ एसोसिएशन ने सबसे सतर्क रुख अपनाते हुए 3.61 का फिटमेंट फैक्टर मांगा है, जिससे न्यूनतम पे ₹65,000 के आसपास रह सकती है.
इन तीनों मांगों के बीच का फासला ही सबसे दिलचस्प है. लेवल एक पर अगर सबसे कम मांगा गया फिटमेंट फैक्टर लागू होता है तो सैलरी करीब ₹65,000 बनेगी, जबकि सबसे ज्यादा मांगे गए आंकड़े पर यही सैलरी ₹72,000 तक पहुंच जाएगी. यानी शुरुआती स्तर पर ही हर महीने करीब ₹7,000 का सीधा अंतर बन जाता है, जो ऊंचे पदों पर जाकर और भी बड़ा हो सकता है.
यह मामला सिर्फ मौजूदा कर्मचारियों तक सीमित नहीं है. नई बेसिक पे से रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन, ग्रेच्युटी की सीमा और कम्यूटेशन राशि भी सीधे जुड़ी होती है. कर्मचारी संगठनों का कहना है कि पिछले एक दशक में देश की आर्थिक वृद्धि और कर राजस्व दोनों में भारी बढ़ोतरी हुई है, इसलिए सरकार पर बड़ी सैलरी बढ़ोतरी का वित्तीय बोझ उठाना मुश्किल नहीं होगा. अब सबकी नजर सरकार की आधिकारिक घोषणा पर टिकी है.