आज से 15 साल पहले की बात याद कीजिए. किसी के हाथ में अगर मोबाइल होता था, तो 90 प्रतिशत चांस था कि उस पर 'NOKIA' लिखा होगा. वो 1100 वाला सांप वाला गेम, वो रिंगटोन और वो दो हाथ मिलाने वाला लोगो, नोकिया सिर्फ एक फोन नहीं, एक जज्बात था. फिर आया एप्पल और एंड्रॉइड का दौर, और धीरे-धीरे नोकिया गायब होने लगा. 2014 में जब नोकिया ने अपना फोन बनाने वाला धंधा माइक्रोसॉफ्ट को बेचा, तो पूरी दुनिया ने मान लिया कि एक दिग्गज का अंत हो गया है.
लेकिन आज 2026 की शुरुआत में जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आती है. नोकिया खत्म नहीं हुआ, बल्कि उसने अपना चोला बदल लिया है. आज भले ही आपकी जेब में नोकिया का फोन न हो, लेकिन जिस इंटरनेट और नेटवर्क के दम पर आप यह आर्टिकल पढ़ रहे हैं, उसकी रग-रग में नोकिया बसा है. चलिए समझते हैं कि कैसे फोन बेचकर भी नोकिया आज दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में शामिल हो गई.
साल 2013-14 नोकिया के लिए सबसे बुरा दौर था. सैमसंग और एप्पल ने इसे बाजार से लगभग बाहर कर दिया था. तब नोकिया ने एक बड़ा फैसला लिया- अपने 'डिवाइसेस और सर्विसेज' बिजनेस को माइक्रोसॉफ्ट को 5.44 बिलियन यूरो में बेच दिया.
आम लोगों को लगा कि नोकिया ने सरेंडर कर दिया. लेकिन असल में नोकिया ने अपने पैरों की वो बेड़ियां काट दी थीं जो उसे भारी घाटे में ढकेल रही थीं. इस डील की सबसे चालाकी भरी बात यह थी कि नोकिया ने अपना 'नाम' और 'पेटेंट्स' (Patents) नहीं बेचे. माइक्रोसॉफ्ट को सिर्फ 10 साल के लिए पेटेंट इस्तेमाल करने का लाइसेंस दिया गया. नोकिया ने अपना वह हिस्सा बेचा जो डूब रहा था और उस पैसे को वहां लगाया जहां भविष्य था- यानी 'नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर' में.
फोन बेचने के बाद नोकिया ने अपना पूरा फोकस मोबाइल टावर, ऑप्टिकल फाइबर और नेटवर्क गियर पर लगा दिया. 2016 में नोकिया ने 'अल्काटेल-ल्यूसेंट' (Alcatel-Lucent) नाम की कंपनी को 15.6 बिलियन यूरो में खरीद लिया. यह टेक इतिहास के सबसे बड़े सौदों में से एक था.
इस एक फैसले ने नोकिया को हुवावे और एरिक्सन के सामने ला खड़ा किया. अब नोकिया सिर्फ एक फोन कंपनी नहीं थी, बल्कि वह कंपनी बन गई थी जो दुनिया के देशों को 4G और 5G का ढांचा बनाकर दे रही थी. साथ ही उसे मिला दुनिया का सबसे मशहूर रिसर्च सेंटर 'बेल लैब्स' (Bell Labs). बेल लैब्स वही जगह है जिसने दुनिया को ट्रांजिस्टर और लेजर जैसी चीजें दी हैं. आज नोकिया के पास 31,000 से ज्यादा पेटेंट परिवार हैं, जो उसे रिसर्च की दुनिया में सबसे आगे रखते हैं.
यह बात सुनकर शायद आपको यकीन न हो, लेकिन सच यही है. नोकिया ने फोन बनाना भले ही छोड़ दिया हो, लेकिन फोन चलाने वाली 'टेक्नोलॉजी' पर आज भी उसी का कब्जा है. नोकिया के पास 5G के 7,000 से ज्यादा ऐसे पेटेंट्स हैं जो 'अनिवार्य' (Standard Essential Patents) माने जाते हैं.
इसका सीधा मतलब यह है कि अगर एप्पल, सैमसंग, ओप्पो या वीवो जैसी कंपनियां अपना 5G फोन बेचना चाहती हैं, तो उन्हें नोकिया की टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करनी ही होगी. और इसके बदले में ये कंपनियां नोकिया को हर साल करोड़ों डॉलर की रॉयल्टी देती हैं. फरवरी 2025 की रिपोर्ट बताती है कि नोकिया का पेटेंट बिजनेस (नोकिया टेक्नोलॉजीज) हर साल करीब 1.3 से 1.5 बिलियन यूरो की कमाई सिर्फ घर बैठे रॉयल्टी से करता है.
इतना ही नहीं, अब तो मर्सिडीज जैसी कार कंपनियां और अमेजन जैसे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म भी नोकिया को पैसा देते हैं क्योंकि उनकी कनेक्टेड कारों और वीडियो स्ट्रीमिंग में नोकिया की टेक्नोलॉजी लगी है.
2023 में नोकिया ने अपना 60 साल पुराना लोगो बदल दिया. नया लोगो कुछ कटा-छटा और मॉडर्न सा है. यह इस बात का संकेत था कि अब नोकिया आम ग्राहकों (B2C) के लिए नहीं, बल्कि दूसरी कंपनियों (B2B) के लिए काम करेगा.
नोकिया अब आम जनता को फोन नहीं बेचता, बल्कि वह फैक्ट्रियों, बंदरगाहों और खदानों को 'प्राइवेट वायरलेस नेटवर्क' बेचता है. इसे 'इंडस्ट्रियल मेटावर्स' कहा जा रहा है. आज दुनिया की बड़ी-बड़ी ऑटोमैटिक फैक्ट्रियों में जो रोबोट्स काम कर रहे हैं, उन्हें नोकिया का प्राइवेट 5G नेटवर्क सिग्नल देता है. 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 87% कंपनियां जो नोकिया का प्राइवेट नेटवर्क इस्तेमाल कर रही हैं, उन्हें एक साल के भीतर ही अपना पैसा वसूल (ROI) होता दिख रहा है.
नोकिया के लिए भारत सिर्फ एक मार्केट नहीं, बल्कि उसकी रिसर्च का केंद्र है. बेंगलुरु में नोकिया ने अपनी '6G लैब' शुरू की है, जो भारत के 'भारत 6G विजन' में कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही है.
यहां ऐसी टेक्नोलॉजी पर काम हो रहा है जहां मोबाइल नेटवर्क सिर्फ बात करने के काम नहीं आएगा, बल्कि वह एक 'सेंसर' की तरह काम करेगा. यानी बिना किसी कैमरे के नेटवर्क यह बता पाएगा कि सड़क पर कितनी भीड़ है या किसी सुनसान जगह पर कोई हादसा तो नहीं हुआ. यह 6G का वह भविष्य है जिसे नोकिया आज बेंगलुरु में बैठकर हकीकत बना रहा है.
अक्टूबर 2025 में एक और बड़ी खबर आई- दुनिया की सबसे कीमती एआई कंपनी एनवीडिया ने नोकिया में 1 बिलियन डॉलर का निवेश किया है. दोनों कंपनियां मिलकर 'AI-RAN' टेक्नोलॉजी बना रही हैं. यह ऐसी चीज है जो मोबाइल टावरों को 'स्मार्ट' बना देगी. अब टावर सिर्फ सिग्नल नहीं देंगे, बल्कि वे खुद डेटा प्रोसेस करेंगे और बिजली की बचत भी करेंगे.
इसके अलावा, नोकिया ने हाल ही में 'इन्फिनेरा' (Infinera) कंपनी को खरीदकर डेटा सेंटर की दुनिया में भी अपनी धाक जमा ली है. अब जब पूरी दुनिया एआई और क्लाउड की बात कर रही है, तो उस डेटा को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए जिस 'ऑप्टिकल नेटवर्क' की जरूरत है, उसमें नोकिया दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी बन गई है .
तो क्या नोकिया खत्म हो गया था? बिल्कुल नहीं. वह बस आपकी नजरों से ओझल होकर सिस्टम के पीछे चला गया. आज नोकिया एक ऐसी कंपनी है जिसकी परमिशन के बिना शायद ही कोई 5G फोन दुनिया में बन सके. वह दुनिया भर के इंटरनेट की रीढ़ (Backbone) बन चुका है.