नई दिल्ली: क्या आने वाले कुछ सालों में इंसान जानवरों की भाषा समझ पाएगा? वैज्ञानिकों का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI इस दिशा में बड़ी सफलता दिला सकता है. रिसर्चर्स AI के साथ छोटे-छोटे खास उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो जानवरों की आवाज, उनकी एक्टिविटीज और बीहेव्यिर को रिकॉर्ड करते हैं. इन गैजेट्स को Biologgers कहा जाता है.
कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर रिसर्च इसी तरह आगे बढ़ती रही तो 2030 तक जानवरों के कम्युनिकेशन को समझने में बड़ी सफलता मिल सकती है. हालांकि, अभी ऐसा कोई AI सिस्टम मौजूद नहीं है जो भरोसे के साथ बता सके कि कोई व्हेल, भेड़िया या पक्षी आपस में क्या बात कर रहा है.
वैज्ञानिक जानवरों की आवाज और उनकी एक्टिविटीज से जुड़े बहुत बड़े डाटा को इकट्ठा कर रहे हैं. Biologgers जानवरों के शरीर पर लगाए जाते हैं और ये उनकी आवाज, मूवमेंट और दूसरे व्यवहार को रिकॉर्ड कर सकते हैं. इसके बाद इस बड़े डाटा को AI मॉडल में डाला जाता है. AI अलग-अलग आवाजों और व्यवहार के बीच पैटर्न खोजने की कोशिश करता है.
इंसान सदियों से जानवरों के व्यवहार को समझने की कोशिश करता रहा है. वैज्ञानिकों ने प्राचीन समय की ऐसी हड्डी की बांसुरियां भी खोजी हैं, जिनका इस्तेमाल शायद पक्षियों की आवाज की नकल करने के लिए किया जाता था. आधुनिक दौर में वैज्ञानिक आईरेन पेपरबर्ग ने एलेक्स ने एलेक्स नाम के अफ्रीकन ग्रे पैरट पर रिसर्च की थी. वहीं, जेन गुडऑल ने कई दशकों तक चिम्पैंजी के व्यवहार, आवाज और सामाजिक संकेतों का अध्ययन किया. अब AI इस रिसर्च को बहुत बड़े स्तर पर ले जाने में मदद कर सकता है.
अगर वैज्ञानिक जानवरों के संकेतों और आवाजों का सही मतलब समझने लगते हैं, तो इसका फायदा वाइल्डलाइफ कन्वर्सेशन में हो सकता है. इससे वैज्ञानिक जानवरों की जरूरत, तनाव और व्यवहार को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे. हालांकि, इस तकनीक के साथ खतरे भी जुड़े हैं. अगर AI किसी जानवर की खास आवाज का मतलब समझ लेता है, तो इसका गलत इस्तेमाल शिकारी कर सकते हैं.
शिकार करने वाले लोग पहले भी रिकॉर्ड की गई जानवरों की आवाज और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल उन्हें आकर्षित करने के लिए कर चुके हैं. भविष्य में AI अगर जानवरों के संकेतों को ज्यादा सटीक तरीके से समझने लगे, तो इसका दुरुपयोग वन्यजीवों के लिए खतरा बन सकता है.