उत्तराखंड में बढ़ती कचरा प्रबंधन की चुनौती से निपटने के लिए सरकार अब नई योजना पर काम कर रही है. राज्य के प्रत्येक नगर निकाय क्षेत्र में गीले और जैविक कचरे से बायोगैस बनाने का प्लांट लगाया जाएगा. सरकार की योजना इस कचरे का इस्तेमाल कर कंप्रेस्ड बायो गैस यानी CBG तैयार करने के साथ साथ जैविक अवशेष से खाद बनाने की है. राज्य के शहरी निकायों से हर दिन करीब 1,984 टन ठोस कचरा निकलता है. इसमें लगभग 702 टन गीला और 650 टन सूखा कचरा शामिल है. सरकार का मानना है कि गीले कचरे को स्थानीय स्तर पर उपयोग में लाकर कचरा निस्तारण की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
शहरी विकास निदेशक विनोद गिरी गोस्वामी के अनुसार, घरों, होटलों, बाजारों, सब्जी मंडियों और अन्य स्थानों से निकलने वाले गीले कचरे को सीबीजी प्लांट तक पहुंचाया जाएगा. यहां जैविक कचरे की मदद से गैस तैयार की जाएगी. इसके बाद गैस को शुद्ध कर कंप्रेस्ड बायो गैस में बदला जाएगा. इस प्रक्रिया के बाद बचने वाले जैविक पदार्थ का इस्तेमाल खाद तैयार करने में किया जा सकता है. इस व्यवस्था से एक तरफ शहरों में निकलने वाले गीले कचरे का बेहतर इस्तेमाल होगा, वहीं दूसरी तरफ कचरा डंप करने के लिए लैंडफिल साइट पर निर्भरता भी कम होगी.
उत्तराखंड के शहरी क्षेत्रों में हर दिन बड़ी मात्रा में गीला कचरा निकलता है. इसमें घरों से निकलने वाला जैविक कचरा, होटलों और रेस्टोरेंट का कचरा, सब्जी मंडियों से निकलने वाले अवशेष और बाजारों से निकलने वाली जैविक सामग्री शामिल है. सरकार के अनुसार राज्य में रोज करीब 702 टन गीला कचरा निकलता है. सीबीजी प्लांट के लिए यही कचरा प्रमुख कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा. देहरादून में रोज करीब 258 टन गीला कचरा निकलता है. इसके अलावा हरिद्वार में करीब 155 टन और ऊधम सिंह नगर में लगभग 121 टन गीला कचरा प्रतिदिन निकलता है. ऐसे शहरों में सीबीजी प्लांट के लिए पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल उपलब्ध हो सकता है.
उत्तराखंड में रोज करीब 650 टन सूखा कचरा भी निकलता है. इसमें कागज, प्लास्टिक, धातु, कांच और अन्य सामग्री शामिल होती है. सरकार ने पहले सूखे कचरे से बिजली बनाने की योजना पर भी विचार किया था. हालांकि पहाड़ी राज्य होने के कारण कई क्षेत्रों में बिजली संयंत्र को लगातार चलाने के लिए पर्याप्त मात्रा में सूखा कचरा उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण है. राज्य के अलग अलग इलाकों से सूखा कचरा एक स्थान पर लाने में परिवहन लागत भी काफी बढ़ सकती है. इसी वजह से सूखे कचरे से बिजली उत्पादन की योजना अभी तक अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाई है. इसके मुकाबले गीले कचरे से सीबीजी बनाने की व्यवस्था को स्थानीय स्तर पर लागू करना ज्यादा व्यावहारिक माना जा रहा है.