देहरादून: प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक पर्यटन के लिए पहचान रखने वाला उत्तराखंड अब अपनी साहित्यिक विरासत को नई पहचान देने की तैयारी में है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार ने साहित्य, संस्कृति और लोकभाषाओं के संरक्षण के लिए कई अहम फैसले लिए हैं. इनमें दो मॉडल साहित्य ग्राम की स्थापना, दुर्लभ पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण और अप्रकाशित साहित्य के प्रकाशन की योजना शामिल है. सरकार का उद्देश्य उत्तराखंड को वैश्विक स्तर पर साहित्यिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बनाना है.
राज्य सरकार ने गढ़वाल और कुमाऊं मंडल में एक-एक साहित्य ग्राम विकसित करने का फैसला किया है. इन केंद्रों में पुस्तकालय, राइटर्स रेजीडेंसी, कार्यशाला कक्ष, पांडुलिपि संग्रहालय और ओपन एयर थिएटर जैसी आधुनिक सुविधाएं विकसित की जाएंगी. यहां लेखक, शोधार्थी और साहित्य प्रेमी शांत वातावरण में अध्ययन और सृजन का अवसर प्राप्त कर सकेंगे.
उत्तराखंड के गांवों और निजी संग्रहों में सुरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों को खोजकर उनका उच्च गुणवत्ता वाला डिजिटलीकरण किया जाएगा. संस्कृति और भाषा विभाग विशेष अभियान चलाकर इन दस्तावेजों को संरक्षित करेगा. जिन महत्वपूर्ण रचनाओं का अब तक प्रकाशन नहीं हो पाया है, उन्हें आर्थिक सहायता देकर प्रकाशित कराया जाएगा ताकि यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके.
सरकार ने हिंदी, गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी, उर्दू और पंजाबी भाषाओं के रचनाकारों को सम्मानित करने की नई पहल शुरू की है. उत्कृष्ट साहित्यकारों को नकद पुरस्कार, प्रशस्ति पत्र और अंगवस्त्र प्रदान किए जाएंगे. वरिष्ठ साहित्यकारों के जीवनभर के योगदान को विशेष सम्मान देकर नई पीढ़ी को साहित्य और लोकभाषाओं से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा.
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उत्तराखंड केवल आध्यात्मिक और प्राकृतिक धरोहर का प्रदेश नहीं, बल्कि महान साहित्यकारों की कर्मभूमि भी है. उन्होंने कहा कि सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, शैलेश मटियानी, शिवानी और अन्य विभूतियों की विरासत को सुरक्षित रखना सरकार की प्राथमिकता है. साहित्य ग्राम इसी दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित होंगे.
सरकार का मानना है कि साहित्यिक पर्यटन से राज्य की अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिलेगी. कौसानी, रामगढ़, मसूरी और अन्य साहित्यिक स्थलों पर देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों से स्थानीय होमस्टे, परिवहन, हस्तशिल्प और गाइड सेवाओं को बढ़ावा मिलेगा. इससे सांस्कृतिक पहचान मजबूत होने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी विकसित होंगे.