देहरादून: नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाते हुए पढ़ाई के लिए उम्र की पारंपरिक सीमाओं को लगभग समाप्त कर दिया है. अब केवल युवा ही नहीं, बल्कि अधिक उम्र के लोग भी नियमित स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने के लिए आगे आ रहे हैं.
उत्तराखंड के सबसे बड़े सरकारी महाविद्यालय एमबीपीजी कॉलेज में इस बदलाव की स्पष्ट तस्वीर देखने को मिली है, जहां 26 से 45 वर्ष तक के लोगों ने रेगुलर बीए और बीकॉम में दाखिले के लिए आवेदन किया है.
कॉलेज प्रशासन के अनुसार प्रवेश प्रक्रिया के दौरान समर्थ पोर्टल के माध्यम से 56 ऐसे आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिनमें आवेदकों की आयु 26 से 45 वर्ष के बीच है. सबसे अधिक आवेदन कला संकाय यानी बीए पाठ्यक्रम के लिए आए हैं, जबकि पांच अभ्यर्थियों ने बीकॉम में प्रवेश के लिए आवेदन किया है. अधिक उम्र के लोगों की ओर से नियमित स्नातक की पढ़ाई में रुचि दिखाने पर कॉलेज के शिक्षक भी आश्चर्य जता रहे हैं.
आंकड़ों के अनुसार 45 वर्ष आयु के चार लोगों ने आवेदन किया है. इसके अलावा 42, 35, 32 और 31 वर्ष आयु के भी एक एक आवेदक ने प्रवेश के लिए आवेदन किया है. वहीं 26 से 30 वर्ष आयु वर्ग के 30 से अधिक अभ्यर्थियों ने भी नियमित स्नातक पाठ्यक्रम में दाखिले की इच्छा जताई है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव के पीछे नई शिक्षा नीति की महत्वपूर्ण भूमिका है. पहले इंटरमीडिएट के बाद स्नातक में प्रवेश लेने के दौरान यदि किसी विद्यार्थी का एक या अधिक वर्ष का अंतर होता था, तो प्रत्येक वर्ष के हिसाब से उसके अंकों में पांच प्रतिशत की कटौती कर दी जाती थी. इससे कई लोगों के लिए नियमित स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश लेना लगभग असंभव हो जाता था.
नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई है. अब इंटरमीडिएट में निर्धारित न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक होने पर कोई भी व्यक्ति किसी भी उम्र में नियमित स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए आवेदन कर सकता है. इससे उन लोगों को भी नया अवसर मिला है जो किसी कारणवश अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ चुके थे या अब करियर में आगे बढ़ने के लिए नई डिग्री हासिल करना चाहते हैं.
एमबीपीजी कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर एनएस बनकोटी ने बताया कि एनईपी लागू होने के बाद स्नातक प्रवेश नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं. इसी कारण अधिक उम्र के लोग भी अब नियमित स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने के लिए आगे आ रहे हैं. शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव आजीवन शिक्षा की सोच को मजबूत करेगा और लोगों को किसी भी उम्र में अपनी पढ़ाई पूरी करने का अवसर देगा.