उत्तराखंड की पहचान सिर्फ ऊंचे पहाड़ों और खूबसूरत वादियों से नहीं, बल्कि उन मंदिरों से भी है, जिनसे सदियों पुरानी आस्था और लोककथाएं जुड़ी हैं. देहरादून के जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर में स्थित महासू देवता मंदिर भी ऐसा ही एक धाम है. हनोल में बने इस मंदिर को लेकर पांडवों से जुड़ी मान्यताएं प्रचलित हैं. मिश्रित स्थापत्य शैली में बना यह मंदिर समुद्रतल से करीब 1250 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है.
महासू मंदिर के गर्भगृह में श्रद्धालुओं का प्रवेश नहीं होता. यहां केवल पुजारी ही पूजा के समय जा सकते हैं. गर्भगृह में पानी की एक धारा भी निकलती है, लेकिन उसके स्रोत और पानी की निकासी को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है. यही जल श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में दिया जाता है. इसके अलावा यहां एक दिव्य ज्योत के हमेशा जलते रहने की बात भी कही जाती है.
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी हनोल के महासू देवता मंदिर का जिक्र करते हुए श्रद्धालुओं से यहां दर्शन करने की अपील की है. उन्होंने इसे देवभूमि की लोकसंस्कृति, प्राचीन परंपराओं और गहरी आस्था का प्रतीक बताया. मंदिर की खासियत सिर्फ इसकी मान्यताओं तक सीमित नहीं है. यहां की वास्तुकला, गर्भगृह से जुड़ी बातें, प्राचीन मूर्तियां और महासू देवता की परंपरा इसे उत्तराखंड के दूसरे मंदिरों से अलग पहचान देती है.
जनपद देहरादून के जनजातीय अंचल जौनसार-बावर के हनोल में स्थित महासू देवता मंदिर देवभूमि की समृद्ध लोकसंस्कृति, प्राचीन परंपराओं और गहरी आस्था का अद्भुत प्रतीक है। श्रद्धालुओं की अटूट आस्था से जुड़ा यह पावन धाम जनजातीय क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत को अपने में समेटे हुए है।… pic.twitter.com/7ZcZhv1eG6
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) September 10, 2026
मंदिर की खुदाई के दौरान पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को शिव-शक्ति, शिवलिंग, दुर्गा, विष्णु-लक्ष्मी, सूर्य और कुबेर समेत दो दर्जन से ज्यादा प्राचीन मूर्तियां मिली थीं. इन मूर्तियों को हनोल संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है. मंदिर के निर्माण काल को लेकर अलग-अलग जानकारी मिलती है. आम मान्यता इसे नवीं सदी का बताती है, जबकि एएसआई के रिकॉर्ड में इसका निर्माण 11वीं और 12वीं सदी का बताया गया है.
लोकमान्यता के अनुसार पांडव लाक्षागृह से निकलने के बाद इस क्षेत्र में आए थे. एक अन्य मान्यता मंदिर के निर्माण को पांडवों और देव शिल्पी विश्वकर्मा से जोड़ती है. कहा जाता है कि मंदिर के लिए घाटा पहाड़ से पत्थर लाए गए थे. बिना गारे की चिनाई वाला मंदिर कई कटे पत्थरों पर टिका है. गर्भगृह के ऊपर विशाल पत्थर को भीम छतरी कहा जाता है. मंदिर की नक्काशी इसकी खूबसूरती बढ़ाती है.
महासू किसी एक देवता का नाम नहीं, बल्कि चार भाइयों का सामूहिक नाम है. बासिक, पबासिक, बूठिया और चालदा महासू को भगवान शिव के रूप माना जाता है. हनोल में मुख्य रूप से बूठिया महासू की पूजा होती है. बासिक महासू का मंदिर मैंद्रथ और पबासिक महासू का मंदिर ठडियार में है. वहीं चालदा महासू को भ्रमणप्रिय माना जाता है. जौनसार-बावर समेत कई क्षेत्रों में महासू देवता को न्याय के देवता के रूप में पूजा जाता है.