लखनऊ: उत्तर प्रदेश पुलिस सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा के पहले दिन सामान्य हिंदी के पेपर में एक विवादित प्रश्न ने बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया है. 14 मार्च को आयोजित परीक्षा के एक सेट में 'अवसर के अनुसार बदलने वाला' वाक्यांश के लिए 'पंडित' को विकल्प के तौर पर पेश किया गया. छात्र संगठनों और ब्राह्मण समाज ने इसे समाज में विद्वेष फैलाने की साजिश बताया है. विशेषज्ञों की इस चूक ने अब एक व्यापक सामाजिक और प्रशासनिक विवाद का रूप ले लिया है.
दरअसल, परीक्षा के प्रश्न पत्र में 31वें नंबर पर सवाल पूछा गया था कि 'अवसर के अनुसार बदलने वाला' वाक्यांश के लिए उपयुक्त शब्द क्या है. इसके लिए चार विकल्प दिए गए थे- सदाचारी, पंडित, अवसरवादी और निष्कपट. विवाद तब शुरू हुआ जब छात्रों ने देखा कि 'पंडित' जैसे सम्मानित शब्द को अवसरवादी के विकल्प के रूप में रखा गया है. अभ्यर्थियों का तर्क है कि अन्य शब्द व्यक्तिगत गुणों को दर्शाते हैं, जबकि 'पंडित' एक विशिष्ट सामाजिक और धार्मिक पहचान है.
प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के मीडिया प्रभारी प्रशांत पांडेय ने इस विकल्प पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है. उनका कहना है कि यह ब्राह्मण समाज के प्रति गहरी नफरत और विशेषज्ञों की संकुचित मानसिकता को उजागर करता है. पांडेय ने सवाल उठाया कि आखिर एक विद्वान श्रेणी को अवसर देखकर बदलने वाला कैसे कहा जा सकता है. उन्होंने आरोप लगाया कि यह समाज में विद्वेष फैलाने और एक विशेष वर्ग को जानबूझकर निशाना बनाने का शर्मनाक प्रयास है.
इस घटना के बाद ब्राह्मण समाज में भारी नाराजगी देखी जा रही है. समाज के प्रतिनिधियों का स्पष्ट कहना है कि प्रश्न पत्र तैयार करने वाले एक्सपर्ट जातीय मानसिकता से ग्रसित हैं. उन्होंने सरकार से मांग की है कि सामाजिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले और ब्राह्मण समाज को टारगेट करने वाले दोषियों के खिलाफ तुरंत कड़ी कार्रवाई की जाए. विरोधियों के अनुसार, किसी भी समुदाय के सम्मान के साथ ऐसा खिलवाड़ भर्ती बोर्ड की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
यह परीक्षा उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड द्वारा सब इंस्पेक्टर के 4543 पदों के लिए आयोजित हो रही है. प्रदेश के सभी 75 जिलों में बने 1090 केंद्रों पर करीब 15 लाख 75 हजार अभ्यर्थी इसमें शामिल हो रहे हैं. इतनी बड़ी भर्ती में इस प्रकार की त्रुटि होना बोर्ड की पेपर सेटिंग की गुणवत्ता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है. लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ी इस संवेदनशील प्रक्रिया में बोर्ड को अधिक सावधानी और गंभीरता बरतनी चाहिए थी.
फिलहाल भर्ती बोर्ड की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है. हालांकि, छात्रों और संगठनों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है और वे दोषियों पर कार्रवाई की मांग पर अड़े हुए हैं. अभ्यर्थियों का मानना है कि जब तक विवादित विकल्प को हटाकर उत्तरदायी विशेषज्ञों को दंडित नहीं किया जाता, तब तक यह असंतोष थमता नजर नहीं आएगा. अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन इस बढ़ते सामाजिक विवाद को शांत करने के लिए क्या कदम उठाता है.