Women Reservation Bill: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर केंद्र सरकार एक बड़ा कदम उठाने पर विचार कर रही है. सरकार यह संभावना देख रही है कि क्या इस कानून को जनगणना के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया से पहले ही लागू किया जा सकता है. यदि ऐसा होता है तो देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा.
मौजूदा व्यवस्था के अनुसार महिलाओं को आरक्षण तभी लागू होगा जब जनगणना के बाद निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन पूरा हो जाएगा. हालांकि अब सरकार इस नियम में बदलाव की संभावनाओं पर विचार कर रही है. यदि सरकार परिसीमन से पहले ही इसे लागू करना चाहती है तो संसद में एक और संविधान संशोधन विधेयक लाना पड़ेगा. अभी तक इस संबंध में कैबिनेट के सामने कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक स्तर पर चर्चा शुरू हो चुकी है.
परिसीमन वह प्रक्रिया होती है जिसमें जनसंख्या के आधार पर चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं तय की जाती हैं. इसके लिए केंद्र सरकार एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग का गठन करती है. इस आयोग के फैसले अंतिम माने जाते हैं और इन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती. विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर सीटों के पुनर्निर्धारण की जिम्मेदारी परिसीमन आयोग की ही होती है, जबकि चुनाव आयोग सीमित स्तर पर बदलाव कर सकता है.
यदि परिसीमन से पहले महिला आरक्षण लागू किया जाता है तो सीटों के निर्धारण के लिए ‘रोटेशन प्रणाली’ अपनाने पर भी विचार किया जा सकता है. इस प्रणाली के तहत हर चुनाव के बाद आरक्षित सीटें बदल जाती हैं. 1990 के दशक में गीता मुखर्जी समिति ने इसी तरह की व्यवस्था की सिफारिश की थी. इसके अनुसार तीन आम चुनावों के दौरान सभी सीटें कम से कम एक बार महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती थीं.
भारत में महिला आरक्षण का मुद्दा 1996 से चर्चा में रहा है. कई बार संसद में बिल पेश हुआ लेकिन सहमति नहीं बन पाई. आखिरकार सितंबर 2023 में इसे 106वें संविधान संशोधन के रूप में मंजूरी मिली. कानून के अनुसार यह आरक्षण लागू होने के बाद 15 वर्षों तक प्रभावी रहेगा. फिलहाल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए अलग उप-कोटा का प्रावधान है, जबकि विपक्ष अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC महिलाओं के लिए भी आरक्षण की मांग कर रहा है. यदि सरकार परिसीमन से पहले इस कानून को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ती है तो इसे भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को मजबूत करने वाला बड़ा कदम माना जाएगा.