उत्तर प्रदेश के लाखों शहरी नागरिकों को जल्द ही हाउस टैक्स के रूप में अधिक भुगतान करना पड़ सकता है. प्रदेश के कई नगर निगमों में लंबे समय से गृहकर की दरों में कोई बदलाव नहीं हुआ है. इसे देखते हुए उत्तर प्रदेश नगर पालिका वित्तीय संसाधन विकास बोर्ड ने सभी संबंधित नगर निगमों को कर दरों का पुनर्निर्धारण करने के निर्देश दिए हैं.
बोर्ड का मानना है कि मौजूदा समय में नगर निकायों के खर्च लगातार बढ़ रहे हैं, जबकि उनकी आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ सकी है. ऐसे में कर व्यवस्था की समीक्षा जरूरी हो गई है.
हाल ही में आयोजित समीक्षा बैठक में यह तथ्य सामने आया कि प्रदेश के कई शहरों में पिछले डेढ़ दशक से गृहकर की दरें स्थिर बनी हुई हैं. राजधानी लखनऊ में वर्ष 2010 के बाद गृहकर में कोई संशोधन नहीं किया गया. वर्ष 2016 और 2023 में दरें बढ़ाने का प्रयास जरूर हुआ, लेकिन जनप्रतिनिधियों और पार्षदों के विरोध के कारण प्रस्ताव लागू नहीं हो सका. अधिकारियों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और विकास कार्यों की लागत को देखते हुए मौजूदा कर ढांचे की समीक्षा समय की मांग बन गई है.
वित्तीय संसाधन विकास बोर्ड ने वर्ष 2025 की मानक मूल्यांकन प्रणाली के आधार पर कर निर्धारण सूची में संशोधन की प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया है. इसके तहत आवासीय, व्यावसायिक और अन्य श्रेणियों की संपत्तियों का नया मूल्यांकन किया जाएगा. इसी आधार पर गृहकर की नई दरें तय की जाएंगी ताकि कर व्यवस्था अधिक व्यवस्थित और व्यावहारिक बन सके.
बैठक में केवल गृहकर बढ़ाने पर ही चर्चा नहीं हुई, बल्कि नगर निकायों की आय बढ़ाने के अन्य उपायों पर भी मंथन किया गया. अधिकारियों और कर्मचारियों को मिलने वाली कर छूट की समीक्षा, ट्रेड लाइसेंस व्यवस्था में सुधार, नगर निगम परिसरों में स्थित भवनों के कर निर्धारण और गृहकर लागू करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने जैसे विषय भी एजेंडे में शामिल रहे.
बोर्ड का कहना है कि नगर निगमों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और विकास परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने के उद्देश्य से यह कदम उठाया जा रहा है. हालांकि यदि गृहकर की नई दरें लागू होती हैं तो लाखों शहरी परिवारों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ सकता है. ऐसे में अब सभी की नजर नगर निगमों के अंतिम प्रस्ताव और राज्य सरकार के अगले फैसले पर टिकी हुई है.