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'कांग्रेस के मोहरा हैं, PDA को कर गए मायूस,' केशव मौर्य ने लिया अखिलेश यादव से बदला

अखिलेश यादव और केशव प्रसाद मौर्य के बीच सियासी लड़ाई बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है. अखिलेश जहां केशव मौर्य को दिल्ली का मोहरा बता रहे हैं, वहीं केशव मौर्य अखिलेश को कांग्रेस का मोहरा बताकर अपना बदला पूरा कर रहे हैं. दोनों नेताओं के बीच जुबानी जंग जारी है. बीजेपी के अंदरूनी मतभेदों को लेकर सपा प्रमुख आए दिन तंज कस रहे हैं.

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'कांग्रेस के मोहरा हैं, PDA को कर गए मायूस,' केशव मौर्य ने लिया अखिलेश यादव से बदला
Courtesy: Social Media

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने माता प्रसाद पांडेय को उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष क्या बनाया, उन्होंने आफत मोल ले ली. जिस दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक को लेकर अखिलेश यादव भारतीय जता पार्टी (BJP) को घेरते हैं, उन्हीं मुद्दों पर वे खुद घिर गए हैं. अब बीजेपी ने उन्हें पिछड़ों का विरोधी बताया है. अखिलेश यादव, इन दिनों जमकर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य पर जमकर तंज कस रहे हैं, अब केशव मौर्य ने अखिलेश यादव पर जमकर तंज कसा है कि और इशारा किया है कि इस मुगालते में न रहें कि 2027 में समाजवादी पार्टी की सरकार सूबे में बन जाएगी. बीजेपी ही प्रचंड बहुमत से सत्ता में आएगी.

अखिलेश यादव पर हमला बोलते हुए केशव प्रसाद मौर्य ने कहा, 'कांग्रेस के मोहरा सपा बहादुर अखिलेश यादव जी की नेता प्रतिपक्ष चुनते ही असलियत सामने आने से सपा में PDA चालीसा पढ़ने वाले पिछड़ों दलितों के समर्थन से चुनकर आए नेताओं में मायूसी है. भाजपा में सबका साथ विकास और सम्मान है. 2027 में 2017 दोहराना है. कमल खिला है फिर खिलाना है.'

केशव मौर्य ने ले लिया जुबानी बदला

अखिलेश यादव ने 26 जुलाई को दिए गए एक बयान में कहा था, 'भ्रष्टाचार खुल क्यों रहे हैं? क्योंकि कुछ लोग मोहरा बन गए हैं. दिल्ली की वाईफाई के वे पासवर्ड हैं. नई तरीके की टेक्नोलॉजी है तो टेक्नोलॉजी के हिसाब से बोलना पड़ रहा है. आप समझ गए हैं न कौन मोहरा है. सुनने में आया है कि मौर्या जी मोहरा हैं. हम लोग गरीबों के मोहरा हैं.' उन्होंने केशव प्रसाद मौर्य को मोहरा बताया था. अब उन्होंने अखिलेश को कांग्रेस का मोहरा बताकर बदला पूरा कर लिया है. 

क्यों PDA पर घिर गए हैं अखिलेश यादव?

लोकसभा चुनाव 2024 में अखिलेश यादव का सियासी फॉर्मूला, एनडीए के खिलाफ पीडीए रहा है. पीडिए मतलब, पिछड़ा दलित और अल्पसंख्यक. बीजेपी नेताओं का कहना है कि अखिलेश यादव, इन्हीं के भरोसे सत्ता में आए और जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद देने की बारी आई, तब अखिलेश यादव ने यह पद एक ब्राह्मण चेहरे को सौंप दिया. यह तो पीडीए का अपमान है. जिनके भरोसे, सीटें मिलीं, अखिलेश ने उन्हीं का अपमान कर दिया.

'अखिलेश ने PDA को गुमराह कर लिया वोट'

सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही नहीं, अखिलेश यादव बसपा सुप्रीमो मायावती के निशाने पर भी आए हैं. उन्हें भी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का ब्राह्मण होना रास नहीं आया है. अखिलेश यादव के फैसले की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा, 'सपा मुखिया ने लोकसभा आमचुनाव में खासकर संविधान बचाने की आड़ में यहां PDA को गुमराह करके उनका वोट तो जरूर ले लिया, लेकिन यूपी विधानसभा में प्रतिपक्ष का नेता बनाने में जो इनकी उपेक्षा की गई, यह भी सोचने की बात है. जबकि सपा में एक जाति विशेष को छोड़कर बाकी PDA के लिए कोई जगह नहीं. ब्राह्मण समाज की तो कतई नहीं क्योंकि सपा व भाजपा सरकार में जो इनका उत्पीड़न व उपेक्षा हुई है वह किसी से छिपा नहीं. वास्तव में इनका विकास एवं उत्थान केवल BSP सरकार में ही हुआ. अतः ये लोग जरूर सावधान रहें.'

माता प्रसाद को ही क्यों बनाया गया विधानसभा अध्यक्ष?

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक डॉ. प्रमोद उपाध्याय बताते हैं कि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और सपा के वोटबैंक मिलकर अखिलेश की सियासी जमीन मजबूत कर पाए. पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों ने कांग्रेस को मिलकर वोट दिया. वोट दिया तो अप्रत्याशित नतीजे आए. पहली बार सपा के सांसदों की संख्या 37 हो गई. अब अखिलेश यादव की नजर ब्राह्मण तबके पर भी है. यूपी में ब्राह्मण सियासी तौर पर बेहद मजबूत जाति है. यूपी में करीब 12 फीसदी ब्राह्मण वोटर हैं. ऐसे में सपा की पूरी कोशिश है कि इस समीकरण को साधा जाए. अगर अखिलेश शिवपाल को ये जिम्मेदारी देते तो परिवारवाद का आरोप लगता. इससे बचने के लिए ही उन्होंने ये दांव चला है. तीन जातियां पहले से संभली हैं, अब ब्राह्मणों को भी अखिलेश ने साध लिया है.