उत्तर प्रदेश की सत्ता से पिछले एक दशक से दूर समाजवादी पार्टी (सपा) अब आगामी विधानसभा चुनाव के लिए बेहद सतर्कता से अपनी रणनीति तैयार कर रही है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बार चुनाव में उम्मीदवारों को टिकट देने का बरसों पुराना ढर्रा पूरी तरह बदल दिया है. अब राजधानी लखनऊ के पार्टी दफ्तर में बैठकर बड़े नेताओं की सिफारिशों या मजबूत पैरवी के दम पर चुनावी टिकट हासिल करना नामुमकिन हो गया है. पार्टी इस बार केवल डेटा और जमीनी हकीकत को ही तरजीह दे रही है.
सपा नेतृत्व सूबे की सभी 403 विधानसभा सीटों पर संभावित चेहरों की राजनीतिक पकड़ जांचने के लिए दो स्तरीय कसौटी का इस्तेमाल कर रहा है. इसके तहत पहला काम एक निजी एजेंसी द्वारा कराया जा रहा बेहद गोपनीय सर्वे है, जिसमें जनता के बीच नेता की असली लोकप्रियता मापी जा रही है. दूसरा माध्यम जिला संगठन से मिलने वाला सीधा फीडबैक है. अखिलेश यादव खुद प्रदेश कार्यालय में जिला स्तरीय पदाधिकारियों के साथ बैठकें कर संभावित नामों की मजबूती और कमजोरी का रिपोर्ट कार्ड देख रहे हैं.
अखिलेश यादव साल 2017 से सूबे की सत्ता से बाहर हैं और लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुके हैं. हालांकि, साल 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली शानदार सफलता ने उनके हौसलों को नए पंख दिए हैं. पार्टी का मानना है कि साल 2022 के चुनाव में गलत टिकट वितरण की वजह से वे बहुमत से चूक गए थे. इसी वजह से 2027 की चुनावी वैतरणी पार करने के लिए इस बार एजेंसी के आंकड़ों और संगठन की रिपोर्ट का बारीकी से मिलान किया जा रहा है.
सपा में अभी तक शिवपाल सिंह यादव, रामगोपाल यादव और आजम खान जैसे कद्दावर नेताओं की सिफारिशों पर आसानी से टिकट मिल जाते थे. पिछले चुनाव में भी स्वामी प्रसाद मौर्य के कहने पर कई लोगों को मैदान में उतारा गया था. मगर इस बार नियम कड़े हैं. भले ही कोई कितना भी रसूखदार नेता क्यों न हो, अगर उसकी सर्वे रिपोर्ट निगेटिव आई, तो उसका पत्ता कटना तय है. इस फैसले से पार्टी के भीतर चल रही स्थानीय गुटबाजी पर भी लगाम लगेगी.
अखिलेश यादव का मुख्य ध्यान इस बार सिर्फ चुनाव जीतने वाले उम्मीदवारों पर ही नहीं, बल्कि उनकी वफादारी पर भी है. पार्टी ऐसे चेहरों को प्राथमिकता दे रही है जो विपरीत परिस्थितियों या किसी बड़े राजनीतिक प्रलोभन के समय पाला न बदलें और संकट में भी पार्टी के साथ मजबूती से टिके रहें. इसके अलावा, सर्वे एजेंसियां हर सीट के जातीय समीकरण का बारीक विश्लेषण कर रही हैं, ताकि सपा के पारंपरिक पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को सही मायने में जमीन पर उतारा जा सके.
चुनाव में कम समय बचने पर होने वाली हड़बड़ी से बचने के लिए सपा प्रमुख ने एक और बड़ा दांव चला है. वे चयनित उम्मीदवारों को चुनाव से करीब एक साल पहले ही तैयारी के संकेत दे रहे हैं. इसी कड़ी में, जिन सीटों पर सर्वे और स्थानीय फीडबैक का काम पूरा हो चुका है, वहां करीब 100 प्रत्याशियों को क्षेत्र में जाकर काम शुरू करने की हरी झंडी मिल चुकी है. इससे उम्मीदवारों को वोटरों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का पूरा वक्त मिल सकेगा.