लखनऊ में शुक्रवार, 23 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस (UPSIFS) में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संवाद-26 के ‘टेकसंगम’ कार्यक्रम में फॉरेंसिक जांच और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल पर चर्चा हुई. ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन फॉरेंसिक्स एंड इन्वेस्टिगेशन’ विषय पर आयोजित पैनल में विशेषज्ञों ने बताया कि AI अपराधों की जांच को तेज करने और जटिल जानकारियों का विश्लेषण करने में मददगार साबित हो सकता है. हालांकि, इसके निष्कर्षों को बिना जांचे अंतिम मान लेना जोखिमपूर्ण है. विशेषज्ञों के मुताबिक, तकनीक जांचकर्ताओं की क्षमता बढ़ा सकती है, लेकिन पेशेवर अनुभव, मानवीय विवेक और साक्ष्यों की स्वतंत्र पुष्टि की जगह नहीं ले सकती.
पैनल चर्चा में बताया गया कि AI का इस्तेमाल फिंगरप्रिंट के नमूनों की तुलना, DNA से जुड़े जटिल आंकड़ों के विश्लेषण, CCTV फुटेज की जांच और डिजिटल साक्ष्यों के परीक्षण में किया जा सकता है. यह बड़ी मात्रा में उपलब्ध जानकारी को कम समय में छांटकर संदिग्ध गतिविधियों और संभावित पैटर्न की पहचान करने में भी सहायता दे सकता है. अलग-अलग स्थानों पर लोगों की आवाजाही, घटनाओं और व्यक्तियों के बीच संभावित संबंधों को समझने में भी ऐसी तकनीक उपयोगी हो सकती है. इससे जांच अधिकारियों को महत्वपूर्ण सूचनाएं तेजी से मिल सकती हैं और वे आगे की जांच की दिशा तय करने में अधिक सक्षम हो सकते हैं. हालांकि, AI द्वारा पहचाना गया कोई संबंध अपने आप अपराध में संलिप्तता का प्रमाण नहीं माना जा सकता.
पैनल में संदीप जोशी ने कहा कि AI कम समय में बड़ी मात्रा में डेटा का विश्लेषण करके जांच प्रक्रिया को गति दे सकता है. पारंपरिक तरीकों से जिन जानकारियों को खंगालने में लंबा समय लगता है, तकनीक की मदद से उनमें छिपे संभावित पैटर्न सामने लाए जा सकते हैं. इससे जांचकर्ताओं को जरूरी सूचनाएं जल्दी मिल सकती हैं. उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि AI की उपयोगिता केवल सॉफ्टवेयर पर निर्भर नहीं करती. परिणामों की गुणवत्ता के लिए सही डेटा, उपयुक्त हार्डवेयर, प्रभावी सॉफ्टवेयर और विश्लेषण की विश्वसनीय पद्धति जरूरी है. यदि शुरुआती जानकारी गलत या अधूरी होगी, तो तकनीक से निकले निष्कर्ष भी प्रभावित हो सकते हैं.
विशेषज्ञों ने AI से जुड़ी चुनौतियों पर भी चिंता जताई. उनके अनुसार, गलत या पक्षपातपूर्ण डेटा के आधार पर काम करने वाला सिस्टम भ्रामक नतीजे दे सकता है. कई बार AI ऐसा निष्कर्ष भी सामने रख सकता है, जिसे उपलब्ध साक्ष्यों से पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता. इसके अलावा, डीपफेक तकनीक से तैयार किए गए नकली वीडियो, तस्वीरें और अन्य डिजिटल सामग्री जांचकर्ताओं को गुमराह करने के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं. ऐसे मामलों में केवल किसी डिजिटल सामग्री को देखकर उसकी प्रामाणिकता तय करना पर्याप्त नहीं होगा. उसके मूल स्रोत, उसमें संभावित बदलाव और उपलब्ध अन्य साक्ष्यों के साथ उसकी संगति की जांच आवश्यक है. विशेषज्ञों ने कहा कि AI से मिले परिणामों की स्वतंत्र पुष्टि की जानी चाहिए और विश्लेषण के प्रत्येक चरण का रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाना चाहिए.
चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि जांच में AI का लाभ उठाने के लिए तकनीकी सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. जांच से जुड़े डेटा और डिजिटल साक्ष्यों को अनधिकृत पहुंच, छेड़छाड़ और दुरुपयोग से बचाना जरूरी है. यदि किसी सिस्टम के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ की जाती है या उसमें गलत जानकारी डाल दी जाती है, तो उसके परिणाम जांच की दिशा प्रभावित कर सकते हैं. विशेषज्ञों ने ‘AI से सुरक्षा और AI की सुरक्षा’ के सिद्धांत को महत्वपूर्ण बताया. उनके अनुसार, तकनीक के उपयोग के लिए स्पष्ट प्रक्रियाएं, जवाबदेही और कानूनी व नैतिक मानकों का पालन होना चाहिए. साथ ही, जांचकर्ताओं को AI के नतीजों की तुलना अन्य विश्वसनीय स्रोतों और पारंपरिक फॉरेंसिक तरीकों से करनी चाहिए.
पैनल में सेवानिवृत्त कमोडोर सतीश के. सत्यपथी ने कहा कि फॉरेंसिक जांच में AI का सही उपयोग करने के लिए विषय का गहरा ज्ञान, तकनीकी समझ और व्यावहारिक अनुभव जरूरी है. जांचकर्ता को यह समझना चाहिए कि सिस्टम से किस प्रकार के सवाल पूछे जाएं, डेटा की गुणवत्ता कैसे परखी जाए और संभावित त्रुटियों की पहचान कैसे की जाए. उन्होंने डॉ. जीके गोस्वामी के साथ अपने पेशेवर जुड़ाव और वर्ष 2006 के निठारी मामले से जुड़े एक प्रसंग का उल्लेख किया. पत्रकार करण सिंह के साथ बातचीत को याद करते हुए उन्होंने मार्गदर्शन और व्यावहारिक अनुभव के महत्व पर भी प्रकाश डाला. उनका कहना था कि AI जानकारी का विश्लेषण करके संभावित निष्कर्ष दे सकता है, लेकिन अंतिम आकलन के लिए विशेषज्ञ का विवेक आवश्यक है.
सत्यपथी के मुताबिक, फॉरेंसिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता तय करने में उनके संग्रह से लेकर विश्लेषण तक की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है. इसे चेन ऑफ कस्टडी कहा जाता है. इसमें साक्ष्य कब, कहां और किसके द्वारा जुटाया गया, उसे कैसे सुरक्षित रखा गया और किन लोगों के पास उसकी पहुंच रही, इसका रिकॉर्ड शामिल होता है. यदि इस प्रक्रिया में खामी हो, तो साक्ष्य की प्रामाणिकता पर सवाल उठ सकते हैं. इसलिए AI से मिले निष्कर्षों के साथ मूल साक्ष्यों, विश्लेषण की पद्धति और सत्यापन की प्रक्रिया की भी जांच होनी चाहिए. विशेषज्ञों को यह बताने में सक्षम होना चाहिए कि निष्कर्ष किस आधार पर निकाला गया और उसकी विश्वसनीयता कैसे स्थापित की गई.
चर्चा में यह स्पष्ट किया गया कि अदालत में AI की मदद से तैयार निष्कर्षों की स्वीकार्यता लागू कानूनी प्रावधानों और साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर निर्भर करेगी. केवल AI द्वारा कोई नतीजा प्रस्तुत कर देने से वह स्वतः न्यायालय में स्वीकार्य नहीं हो जाता. संबंधित विशेषज्ञ को विश्लेषण की प्रक्रिया, निष्कर्षों की पुष्टि और मामले में उनकी प्रासंगिकता स्पष्ट करनी पड़ सकती है. पैनल के मॉडरेटर डीआईजी टेक्निकल आशीष तिवारी ने फॉरेंसिक विज्ञान की भूमिका को अपराध की रोकथाम, पहचान, जांच और अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण बताया. चर्चा का व्यापक निष्कर्ष यही रहा कि AI आपराधिक न्याय व्यवस्था में उपयोगी सहायक तकनीक बन सकता है, लेकिन उसकी गति के साथ साक्ष्यों की प्रामाणिकता, पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखना भी जरूरी है.