चंडीगढ़: पंजाब में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सियासी सरगर्मियां तेजी से बढ़ने लगी हैं. इस बार मुकाबला केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं बल्कि कांग्रेस के भीतर भी दिखाई दे रहा है. जिस तरह पांच साल पहले पार्टी अंदरूनी खींचतान में उलझ गई थी, उसी तरह के हालात एक बार फिर बनते नजर आ रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर सिंह आमने सामने थे, जबकि अब यह टकराव पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के बीच दिखाई दे रहा है.
कांग्रेस नेतृत्व ने विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए संगठन में संतुलन बनाए रखने की कोशिश की. राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया गया. पार्टी नेतृत्व का मानना था कि इस फैसले से दोनों खेमों के बीच संतुलन बना रहेगा, लेकिन घटनाक्रम ने अलग दिशा पकड़ ली.
सूत्रों के अनुसार चन्नी प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी चाहते थे. जब उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई तो उनके समर्थकों ने संगठन और नेतृत्व को लेकर खुलकर सवाल उठाने शुरू कर दिए. इससे कांग्रेस के भीतर असंतोष की चर्चा फिर तेज हो गई.
हाल के दिनों में चन्नी ने अपने समर्थक पूर्व विधायकों, सांसदों और वरिष्ठ नेताओं के साथ लगातार बैठकें की हैं. मोरिंडा स्थित उनके आवास पर हुई बैठकों को केवल संगठनात्मक चर्चा नहीं बल्कि हाईकमान के लिए एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है.
दूसरी ओर प्रदेश अध्यक्ष राजा वडिंग लगातार विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं से संपर्क साध रहे हैं. वह संगठन को मजबूत करने और चुनावी तैयारी में जुटे हुए हैं. ऐसे में कांग्रेस के भीतर दो समानांतर राजनीतिक धाराएं साफ दिखाई देने लगी हैं.
चन्नी समर्थकों का तर्क है कि पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री होने और निकाय चुनावों में उनके प्रभाव को देखते हुए उन्हें या तो प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए था या फिर 2027 के लिए मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया जाना चाहिए.
कांग्रेस नेतृत्व फिलहाल बिना किसी मुख्यमंत्री चेहरे के चुनाव मैदान में उतरने की रणनीति पर काम कर रहा है. यही बात चन्नी खेमे को स्वीकार नहीं है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यही मतभेद अब खुली गुटबाजी का रूप लेता जा रहा है.
पंजाब कांग्रेस का मौजूदा घटनाक्रम कई नेताओं को 2021 की याद दिला रहा है. उस समय कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच लंबे समय तक चली खींचतान ने पार्टी को कमजोर कर दिया था. संगठनात्मक फैसलों, नेतृत्व और बेअदबी जैसे मुद्दों पर विवाद लगातार गहराता गया.
आखिरकार कांग्रेस हाईकमान को हस्तक्षेप करना पड़ा. कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और बाद में उन्होंने कांग्रेस से भी दूरी बना ली. इसके बाद चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन सिद्धू और चन्नी के बीच भी तालमेल पूरी तरह नहीं बन सका. इसका सीधा असर 2022 के विधानसभा चुनाव में दिखाई दिया, जहां कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा.
2022 की हार के बाद कांग्रेस ने अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था. उनके नेतृत्व में पार्टी ने संगठन को दोबारा सक्रिय किया और 2024 के लोकसभा चुनाव में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया. यही कारण है कि कांग्रेस नेतृत्व ने चुनाव से पहले संगठन में कोई बड़ा बदलाव करने के बजाय वडिंग पर भरोसा बनाए रखने का फैसला किया. हालांकि यह फैसला अब पार्टी के भीतर नए विवाद की वजह बनता नजर आ रहा है.
स्थिति को संभालने के लिए पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल ने दोनों पक्षों से संवाद की कोशिश की. हालांकि राजनीतिक संकेत बताते हैं कि चन्नी फिलहाल अपने रुख पर कायम हैं. बताया जा रहा है कि वह सीधे पार्टी हाईकमान से बातचीत करना चाहते हैं.
चन्नी समर्थकों की मांग है कि कांग्रेस जल्द से जल्द 2027 के लिए मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करे. इसे प्रदेश नेतृत्व के अधिकार क्षेत्र को चुनौती के तौर पर भी देखा जा रहा है.
पंजाब की राजनीति में इस समय आम आदमी पार्टी सत्ता विरोधी माहौल का सामना कर रही है, जबकि शिरोमणि अकाली दल भी अपनी चुनौतियों से जूझ रहा है. ऐसे में कांग्रेस के पास सत्ता में वापसी का अवसर मौजूद है. लेकिन यदि पार्टी एक बार फिर अंदरूनी संघर्ष में उलझी रही तो यह मौका हाथ से निकल सकता है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस नेतृत्व के सामने सबसे बडी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की है. यदि समय रहते मतभेद नहीं सुलझाए गए तो 2027 का चुनाव भी पार्टी के लिए उसी तरह मुश्किल साबित हो सकता है, जैसा 2022 में हुआ था. पंजाब कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा अब विपक्ष से लड़ने की नहीं, बल्कि अपने ही भीतर उठ रहे असंतोष को संभालने की है.