चंडीगढ़: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी को पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार तो है, लेकिन पदोन्नति प्राप्त करना उसका मौलिक अधिकार नहीं है.
अदालत ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी सेवानिवृत्ति से पहले उच्च पद का कार्यभार ग्रहण नहीं कर पाता, तो उसे बाद में नोटनल पदोन्नति या उससे जुड़े वित्तीय लाभ नहीं दिए जा सकते. खंडपीठ में शामिल जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी और जस्टिस अमरजोत भट्टी ने पूर्व पंचायत सचिव इंदर राज भाटिया की अपील खारिज करते हुए एकल पीठ के 1 अप्रैल 2026 के फैसले को बरकरार रखा.
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उनकी नियुक्ति 23 अगस्त 1974 को जालंधर जिले के फिल्लौर में पंचायत सचिव के रूप में हुई थी. वर्ष 2004 में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ था. हालांकि, बाद में विशेष अदालत, लुधियाना ने 23 मई 2014 को उन्हें बरी कर दिया था.
याचिकाकर्ता का कहना था कि वर्ष 2006 में पंचायत अधिकारी के 22 रिक्त पदों को भरने के लिए पदोन्नति प्रक्रिया शुरू की गई थी. विभाग ने वरिष्ठता के आधार पर अधिकारियों का रिकॉर्ड भी मंगवाया था, लेकिन प्रशासनिक देरी के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी. इस बीच वह 30 अप्रैल 2006 को सेवानिवृत्त हो गए, जबकि उनसे जूनियर कर्मचारियों को 21 अगस्त 2006 को पदोन्नत कर दिया गया.
उन्होंने अदालत से मांग की थी कि उन्हें भी नोटनल पदोन्नति देकर उनकी वरिष्ठता, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का पुनर्निर्धारण किया जाए. इस मांग को अदालत ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया.
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि पदोन्नति उस दिन से प्रभावी होती है, जब कर्मचारी वास्तव में उच्च पद का कार्यभार संभालता है. केवल पद रिक्त होने या पदोन्नति की सिफारिश होने से किसी कर्मचारी को पदोन्नति का अधिकार नहीं मिल जाता. अदालत ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी उच्च पद पर कार्य नहीं करता, तो वह उस पद से जुड़े वेतन, भत्ते और अन्य वित्तीय लाभों का दावा भी नहीं कर सकता.