पंजाब में आपराधिक मामलों की जांच में हो रही देरी को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं. न्यायमूर्ति एनएस शेखावत की अदालत ने अमृतसर ग्रामीण जिले में लंबित मामलों की स्थिति सामने आने के बाद कड़ा रुख अपनाया. अदालत ने पंजाब के सभी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों और पुलिस आयुक्तों को अपने अपने क्षेत्रों में तीन साल से ज्यादा समय से लंबित आपराधिक मामलों की पूरी सूची दाखिल करने का आदेश दिया है.
मामले की सुनवाई के दौरान सामने आए आंकड़ों ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े किए. अदालत ने लंबित जांच को जल्द पूरा करने और लंबे समय से फरार आरोपितों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं.
यह मामला जसमाल सिंह उर्फ घोघा उर्फ सोनू की याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया. इससे पहले 23 जुलाई को अदालत ने पाया था कि अमृतसर ग्रामीण के कंबोज थाने में दर्ज एक मामले में नामजद आरोपितों की दो साल से ज्यादा समय तक गिरफ्तारी नहीं हुई थी. हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए याचिकाकर्ता को गिरफ्तार किया. इसके बाद अदालत ने अमृतसर ग्रामीण जिले में तीन साल से ज्यादा समय से लंबित सभी जांच का विस्तृत विवरण मांगा. वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अमृतसर ग्रामीण की ओर से दाखिल हलफनामे में बताया गया कि जिले के अलग अलग थानों में 565 एफआईआर की जांच तीन साल से अधिक समय से लंबित है.
रिपोर्ट के अनुसार इन 565 मामलों में 1219 आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है. वहीं 105 आरोपितों को जांच के दौरान निर्दोष पाया गया. इसके बावजूद 1168 आरोपित अभी तक गिरफ्तार नहीं किए गए हैं. इनमें से केवल 48 आरोपितों को भगोड़ा घोषित किया गया है. हाई कोर्ट ने इस आंकड़े को गंभीर माना. अदालत ने कहा कि संभव है कि कुछ आरोपित देश से बाहर चले गए हों, लेकिन लंबे समय तक उनके खिलाफ भगोड़ा घोषित करने या संपत्ति कुर्क करने जैसी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई. अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि जिन आरोपितों की गिरफ्तारी नहीं हो पा रही है, उनके खिलाफ कानून के तहत जरूरी कदम उठाए जाएं.
सुनवाई के दौरान सामने आया सबसे गंभीर तथ्य 80 जांच फाइलों से जुड़ा रहा. अदालत को बताया गया कि 80 मामलों में जांच अधिकारियों की फाइलें ही उपलब्ध नहीं हैं. हाई कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई. अदालत ने कहा कि तीन साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी जांच से जुड़ी फाइलों का उपलब्ध नहीं होना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है. अदालत ने कहा कि 565 मामलों की जांच का इतने लंबे समय तक लंबित रहना बेहद चिंताजनक है. इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है जो न्याय की उम्मीद में लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं.