नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र महासचिव के चुनाव में इस बार 80 साल पुराना इतिहास बदलने की संभावना दिखाई दे रही है. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से अब तक इस पद पर किसी महिला की नियुक्ति नहीं हुई है. हालांकि, मौजूदा चुनाव प्रक्रिया में तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है. महासचिव पद के लिए मैदान में उतरे आठ उम्मीदवारों में पांच महिलाएं हैं. दूसरे अनौपचारिक मतदान में गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट ने बढ़त बनाकर इस संभावना को और मजबूत कर दिया है.
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना वर्ष 1945 में हुई थी. इसके बाद संस्था के शीर्ष पद यानी महासचिव की जिम्मेदारी अब तक नौ पुरुषों ने संभाली है. इनमें अलग-अलग महाद्वीपों और क्षेत्रों से आने वाले नेता शामिल रहे हैं, लेकिन किसी महिला को यह जिम्मेदारी नहीं मिली. यही वजह है कि इस बार महासचिव पद की दौड़ में महिलाओं की मजबूत मौजूदगी को केवल चुनावी घटनाक्रम नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में संभावित बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है.
गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट ने महासचिव पद की दौड़ में दूसरे अनौपचारिक मतदान के दौरान सबसे ज्यादा समर्थन हासिल किया. उन्हें सुरक्षा परिषद के आठ सदस्यों का समर्थन मिला, जबकि तीन सदस्यों ने उनके खिलाफ राय दी. चार सदस्यों ने किसी पक्ष में अपनी स्थिति जाहिर नहीं की. इस परिणाम के बाद कैरोलिन फिलहाल उम्मीदवारों की सूची में सबसे ऊपर पहुंच गई हैं, हालांकि इसे अंतिम जीत नहीं माना जा सकता.
पहले अनौपचारिक मतदान में कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया था. उन्हें दस सदस्यों का समर्थन मिला था और कैरोलिन बिर्केट नौ समर्थन के साथ दूसरे स्थान पर थीं. दूसरे दौर में समीकरण बदल गए और कैरोलिन आगे निकल गईं. ग्रिन्सपैन को इस बार सात सदस्यों का समर्थन मिला. इससे यह साफ है कि अभी उम्मीदवारों के बीच मुकाबला पूरी तरह खुला हुआ है और आने वाले दौर में तस्वीर फिर बदल सकती है.
अर्जेंटीना के राफेल ग्रॉसी भी महासचिव पद की दौड़ में महत्वपूर्ण उम्मीदवार हैं. वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने का अनुभव रखते हैं. दूसरे अनौपचारिक मतदान में उन्हें सात सदस्यों का समर्थन मिला. हालांकि, उनके खिलाफ छह सदस्यों की राय सामने आई. ऐसे में उनका समर्थन आधार कैरोलिन और ग्रिन्सपैन की तुलना में फिलहाल अधिक चुनौतीपूर्ण दिखाई देता है.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव का चुनाव आम चुनाव की तरह नहीं होता, जिसमें सभी सदस्य देश सीधे किसी उम्मीदवार को वोट देते हैं. पहले सुरक्षा परिषद में उम्मीदवारों के नाम पर कई दौर की अनौपचारिक मतदान प्रक्रिया होती है. सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं. इनमें पांच स्थायी सदस्य और दस अस्थायी सदस्य शामिल हैं. किसी उम्मीदवार के लिए कम से कम नौ सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है, लेकिन केवल नौ वोट हासिल करना ही पर्याप्त नहीं है.
सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के पास वीटो शक्ति होती है. इसलिए किसी उम्मीदवार को पर्याप्त समर्थन मिलने के बावजूद अगर कोई स्थायी सदस्य देश उसके खिलाफ वीटो का इस्तेमाल करता है, तो उसकी दावेदारी मुश्किल में पड़ सकती है. यही कारण है कि शुरुआती मतदान में आगे रहने वाले उम्मीदवार को भी अंतिम विजेता मानना जल्दबाजी होगी. असली राजनीतिक सहमति सुरक्षा परिषद के अंतिम दौर में सामने आएगी.
इस बार की चयन प्रक्रिया की सबसे बड़ी खासियत महिला उम्मीदवारों की संख्या है. आठ उम्मीदवारों में पांच महिलाएं हैं. इससे संयुक्त राष्ट्र में लैंगिक समानता और महिला नेतृत्व का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है. लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि जिस संस्था का उद्देश्य दुनिया में समानता और प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देना है, उसके सर्वोच्च पद पर अब तक कोई महिला क्यों नहीं पहुंची.
महासचिव के चुनाव में केवल उम्मीदवार की व्यक्तिगत योग्यता ही मायने नहीं रखती. संयुक्त राष्ट्र में क्षेत्रीय संतुलन की परंपरा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस बार लैटिन अमेरिका और कैरिबियाई क्षेत्र से उम्मीदवारों की मौजूदगी इसी वजह से खास है. कैरोलिन बिर्केट और रेबेका ग्रिन्सपैन दोनों इसी व्यापक क्षेत्र से आती हैं. इसलिए इस चुनाव में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और राजनीतिक स्वीकार्यता दोनों महत्वपूर्ण मुद्दे बन सकते हैं.
कैरोलिन बिर्केट की दूसरे दौर की बढ़त ने पहली महिला महासचिव बनने की उम्मीद जरूर बढ़ा दी है, लेकिन उनके सामने अभी कई राजनीतिक चुनौतियां हैं. उन्हें आने वाले मतदान में अपना समर्थन बनाए रखने के साथ नए देशों का भरोसा भी हासिल करना होगा. इसके बाद सुरक्षा परिषद को किसी एक नाम पर सहमत होकर उसे संयुक्त राष्ट्र महासभा के पास भेजना होगा. अंतिम फैसला तभी होगा, जब महासभा उस उम्मीदवार की नियुक्ति को औपचारिक मंजूरी देगी.
यानी फिलहाल कहानी का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कैरोलिन बिर्केट आगे हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उनकी मौजूदा बढ़त सुरक्षा परिषद में जरूरी राजनीतिक सहमति में बदल पाएगी. अगर ऐसा हुआ, तो संयुक्त राष्ट्र के 80 साल के इतिहास में पहली बार उसकी कमान किसी महिला के हाथ में आ सकती है.