नई दिल्ली: महाराष्ट्र के मीरा-भायंदर में दशकों पुराने जमीन विवाद ने नया मोड़ ले लिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्कूल के पूर्व सहपाठी असगरअली वोहरा ने मामले की CBI जांच की मांग की है. 81 वर्षीय वोहरा का आरोप है कि 1989 में खरीदी गई उनकी करीब 2,810 वर्गमीटर जमीन से जुड़े दस्तावेज बाद में कथित तौर पर फर्जी तरीके से तैयार किए गए. उन्होंने 8 सितंबर को प्रधानमंत्री से मुलाकात कर पूरे मामले की जानकारी देते हुए हस्तक्षेप की मांग की.
वोहरा के मुताबिक उन्होंने 1989 में भायंदर ईस्ट के नवघर रोड पर करीब 2,810 वर्गमीटर जमीन पंजीकृत समझौते के जरिए खरीदी थी. उनका दावा है कि उन्होंने इस जमीन को कभी बेचा या किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं किया. इसके बावजूद उनका आरोप है कि 2011 में कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए और जमीन को उनकी जानकारी के बिना दो हिस्सों में बांट दिया गया.
वोहरा का आरोप है कि जमीन के एक हिस्से पर स्वयम बिल्डर्स का कब्जा दिखाया गया, जबकि दूसरे हिस्से पर सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शंस का नियंत्रण बताया गया. सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शंस का संबंध बीजेपी विधायक नरेंद्र मेहता से बताया गया है. हालांकि, ये सभी आरोप वोहरा की शिकायत और दावों पर आधारित हैं, जिनकी जांच होना बाकी है.
वोहरा ने कथित दस्तावेजी फर्जीवाड़े को लेकर 2015 में FIR दर्ज कराई थी. उनका कहना है कि मामले में CID की रिपोर्ट करीब 11 साल बाद 2026 में सामने आई. उन्होंने इस देरी पर सवाल उठाते हुए आशंका जताई कि अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव रहा हो सकता है. वोहरा ने 2025 में उनके खिलाफ दर्ज किए गए एक जवाबी मामले पर भी आपत्ति जताई है.
वोहरा ने आरोप लगाया कि मीरा-भायंदर नगर निगम के टाउन प्लानिंग विभाग ने उनके स्वामित्व के दावे वाली जमीन पर निर्माण की अनुमति दे दी. उन्होंने नगर निगम, राजस्व विभाग और स्थानीय पुलिस के अधिकारियों पर भी कथित फर्जी दस्तावेजों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया. अब उन्होंने बिल्डरों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है.
वोहरा ने वर्षों तक पुलिस, राजस्व विभाग और नगर निगम के स्तर पर मामला उठाने के बाद प्रधानमंत्री मोदी से संपर्क किया. 8 सितंबर को उन्होंने प्रधानमंत्री को अपनी शिकायत सौंपी और CBI जांच की मांग की. इसके बाद स्थानीय नगर प्रशासन ने मामले पर संज्ञान लिया है. 16 सितंबर को सुनवाई तय की गई है, जिसमें संबंधित कंपनियों के प्रतिनिधियों को उपस्थित होने के निर्देश दिए गए हैं.