रांची में मार्च महीने से शुरू हुआ गैस सिलेंडर संकट अब तक पूरी तरह सामान्य नहीं हो सका है. युद्ध के असर, कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और पैनिक बुकिंग की वजह से शहर में बैकलॉग तेजी से बढ़ा. कई इलाकों में अब भी कतारें देखी जा रही हैं, जबकि कुछ एजेंसियों ने होम डिलीवरी की गति बढ़ाई है. जिला प्रशासन की सख्ती के बाद हालात कुछ बेहतर जरूर हुए हैं, लेकिन लोगों की परेशानी अब भी कम नहीं हुई है.
मार्च की शुरुआत में शहर में गैस वितरण सामान्य था. न एजेंसी कार्यालयों में भीड़ दिखी और न गोदामों पर अफरा-तफरी. लेकिन 7 मार्च को घरेलू सिलेंडर में 60 रुपये तथा वाणिज्यिक सिलेंडर में 114.50 रुपये की बढ़ोतरी ने स्थिति बदलने की शुरुआत कर दी. कीमत बढ़ने के बाद भी शुरुआती दिनों में कोई बड़ी समस्या सामने नहीं आई.
8 मार्च से एजेंसियों के बाहर लोगों की भीड़ दिखने लगी. तेल कंपनियों ने दोबारा सिलेंडर लेने पर 25 दिन की कैपिंग लगा दी और डीएसी कोड अनिवार्य कर दिया. इससे समस्या और बढ़ गई. 9 और 10 मार्च को कतारें लंबी होती रहीं. बैकलॉग तेजी से बढ़ने लगा और बुकिंग के बाद सात-सात दिन तक होम डिलीवरी नहीं हो पा रही थी. होटल-रेस्टोरेंट में डीजल भट्टी और कोयले का उपयोग बढ़ गया, जिससे कोयले की कीमतें भी चढ़ गईं.
तीसरे सप्ताह में हालात बदतर होते गए. बैकलॉग बढ़ने से बड़ी संख्या में लोगों ने नए कनेक्शन के लिए आवेदन देना शुरू किया, जिसके बाद एजेंसियों ने अस्थायी रोक लगा दी. 17 मार्च को प्रशासन ने होम डिलीवरी के कड़े निर्देश दिए, लेकिन इसके बावजूद कई एजेंसियों ने इसे लागू नहीं किया. शहर में बैकलॉग 70 हजार के करीब पहुंच गया. कई इलाकों में दिनभर लंबी कतारें लगती रहीं और व्यावसायिक सिलेंडर की आपूर्ति लगभग ठप हो गई.
चौथे सप्ताह तक कई एजेंसियों ने होम डिलीवरी तेज कर दी, लेकिन बैकलॉग में बड़ी कमी नहीं आई. 24 मार्च को कैपिंग 25 से बढ़ाकर 35 दिन कर देने की जानकारी फैलते ही पैनिक बुकिंग फिर बढ़ गई. कई जगह हंगामे और तोड़फोड़ भी हुई. हालांकि रामनवमी की छुट्टी के बाद जब कार्यालय खुले, तो स्थिति पहले से थोड़ी सामान्य दिखी. कुछ इलाकों को छोड़कर लंबी कतारें कम दिखाई दीं, लेकिन बैकलॉग अब भी 65 हजार के आसपास बना हुआ है.