पटना में होने जा रही राष्ट्रीय जनता दल की अहम राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक ने बिहार की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है. संकेत मिल रहे हैं कि नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जा सकता है. हालांकि लालू प्रसाद यादव 2028 तक राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे, लेकिन सक्रिय जिम्मेदारी तेजस्वी को सौंपने की तैयारी है. सवाल यह है कि दशकों से पार्टी की कमान संभाल रहे लालू यादव अब ऐसा कदम क्यों उठा रहे हैं.
राजद लंबे समय से ‘जंगलराज’ के राजनीतिक आरोप से जूझती रही है, जिसे विपक्ष हर चुनाव में हवा देता है. लालू यादव चेहरा बने रहने से यह टैग फिर उभर जाता है. तेजस्वी को आगे लाकर पार्टी खुद को नई पीढ़ी, विकास और समावेशी राजनीति के प्रतीक के रूप में पेश करना चाहती है, ताकि पुराने आरोपों की धार कुंद की जा सके.
लालू यादव की उम्र, किडनी ट्रांसप्लांट और कई गंभीर बीमारियों ने उनकी सक्रियता सीमित कर दी है. इसके साथ ही चारा घोटाला, लैंड फॉर जॉब और अन्य मामलों की कानूनी प्रक्रिया भी समय और ऊर्जा लेती है. ऐसे में रोजमर्रा की संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाना उनके लिए व्यावहारिक रूप से कठिन होता जा रहा है.
हाल के चुनावों में लालू यादव की सीधी मौजूदगी वाले क्षेत्रों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले. 2024 लोकसभा चुनाव में सारण सीट इसका उदाहरण रहा. विश्लेषकों का मानना है कि अब मतदाता नेतृत्व में ताजगी और भविष्य की स्पष्ट तस्वीर देखना चाहते हैं, जो तेजस्वी यादव के जरिए संभव मानी जा रही है.
महागठबंधन के भीतर कांग्रेस और अन्य सहयोगी दल अब अधिक आत्मविश्वास के साथ फैसले ले रहे हैं. पहले जहां लालू यादव की राय निर्णायक होती थी, वहीं अब बातचीत का केंद्र तेजस्वी बनते दिख रहे हैं. यह बदलाव राजद को गठबंधन में नई भूमिका दिलाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
तेजप्रताप यादव के बयानों और पारिवारिक असहमतियों ने पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया है. जानकारों का मानना है कि लालू यादव अब खुद पीछे हटकर तेजस्वी को स्वतंत्र निर्णय लेने का अवसर देना चाहते हैं, ताकि पार्टी और परिवार दोनों में स्थिरता लाई जा सके.
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम लालू यादव की कमजोरी नहीं, बल्कि समय की मांग को समझने का संकेत है. तेजस्वी यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर राजद आने वाले चुनावों के लिए खुद को नए सांचे में ढालने की कोशिश कर रही है.