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नीतीश के बिना भी बिहार में BJP बना सकती है सरकार, जानें चिराग के साथ मिलकर कैसे होगा खेला?

बिहार में NDA जहां प्रचंड जीत की ओर अग्रसर है, वही बीजेपी के शानदार प्रदर्शन से एक नया राजनीतिक समीकरण आकार लेता नजर आ रहा है और वो समीकरण है बिहार में नीतीश के बिना बीजेपी की सरकार. आखिर क्यों इस समीकरण की चर्चा हो रही है?

Kanhaiya Kumar Jha
नीतीश के बिना भी बिहार में BJP बना सकती है सरकार, जानें चिराग के साथ मिलकर कैसे होगा खेला?
Courtesy: X

पटना: बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी-जदयू नीट NDA प्रचंड जीत की ओर अग्रसर है और महागठबंधन का सूपड़ा साफ़ होता नजर आ रहा है. NDA की इस बम्पर ने जीत ने सारे एग्जिट पोल्स के अनुमानों को भी फेल कर दिया है.

चुनावी नतीजों के इस माहौल में एक बात की सबसे बड़ी चर्चा है और वो है बीजेपी की शानदार प्रदर्शन की. इस चुनाव में बीजेपी और जदयू ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा था और भाजपा ने 91 सेटों पर बढ़त बना राखी है. रुझान अगर परिणामों में तब्दील होते हैं, तो भाजपा बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. भाजपा ने 2010 के चुनाव में भी इतनी ही सीटें पाई थीं, लेकिन तब सबसे बड़ी पार्टी जेडीयू थी. हालांकि इस बार हालात अलग हैं.

क्या बीजेपी के पास फ्रंट फुट पर खेलने का है अवसर?

2020 के विधानसभा चुनाव के परिणामों की तुलना में जेडीयू का भी प्रदर्शन शानदार रहा है और 79 सीटें लेकर भाजपा से 12 सीट पीछे है. इन नतीजों से एक विशेष राजनीति समीकरण का रास्ता नजर आ रहा है और वो है भाजपा का जेडीयू के बिना भी बिहार की सत्ता में पहुंचने का रास्ता. हालांकि यह समीकरण चिराग पासवान की लोजपा-आर, जीतनराम मांझी की HAM और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोकमोर्चा का मूड क्या है? इस पर टिका है, लेकिन वो कहते हैं न कि राजनीति में कौन सा समीकरण कब फिट हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता.

जदयू को छोड़कर कैसे जादुई आंकड़ा हासिल कर सकती है बीजेपी?

दरअसल 243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में सत्ता में पहुंचने का नंबर 122 है. अब अकेले भाजपा के पास 91 सीटें है तो खुद को पीएम मोदी का हनुमान कहने वाले चिराग पासवान के पास भी 21 सीटें हैं. दोनों को मिलाकर सीटों की संख्या 112 हो जाती है. इसके अलावा HAM की 5 और RLM की 4 सीटों को मिलाकर 121 नंबर होते हैं. बसपा का भी एक कैंडिडेट जीतता दिख रहा है.

बीजेपी के लिए कैसे X फैक्टर हैं नीतीश कुमार?

यदि बसपा का समर्थन मिल जाए तो पूर्ण बहुमत हासिल हो जाएगा. हालांकि यह सिर्फ एक विकल्प है और भाजपा शायद ही ऐसा करना चाहेगी. ऐसा इसलिए क्योंकि नीतीश कुमार अब भी बिहार में एक फैक्टर हैं. इसके अलावा यदि वह चाहें तो वह भी सरकार बनाने का दम रखते हैं. इतना ही नहीं, अगर बीजेपी को छोड़ कर वो महागठबंधन के साथ सरकार बनाए तो ऐसी सरकार में वह कंफर्ट में भी होंगे क्योंकि यदि भाजपा को छोड़कर वह निकले तो कम ताकत वाली आरजेडी उनके साथ होगी और यहां नीतीश कुमार को राजनीतिक फैसले लेने की आजादी भी होगी.

नीतीश कुमार के पास क्या हैं विकल्प?

दरअसल, 79 सीटों वाली जदयू अगर आरजेडी की 28, कांग्रेस की 5, ओवैसी की 5 और अन्य की 9 सीटों को मिला ले तो नीतीश कुमार भी अलग होकर सरकार बना सकते हैं. इस तरह यह नतीजा बेहद रोचक है और जो नतीजे हैं वो बेहद मजेदार. इन नतीजों ने एक साथ कई राजनीतिक विकल्प पेश किए हैं, जिससे ये अंदाजा लगाना मुश्किल है कि आखिर कौन सा समीकरण अंतिम रूप लेता है. नीतीश कुमार के सामने बीजेपी को छोड़ने के बाद सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि उन्हें कई ऐसे दलों को साधना होगा, जो अतिवादी हैं और नीतीश की उदार विचारधारा से मेल नहीं खाते, जैसे असदुद्दीन ओवैसी.