नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई ऐसे खिलाड़ी हुए हैं जिन्होंने कम समय में बड़ी पहचान बनाई लेकिन लंबे समय तक खुद को कायम नहीं रख पाए. विनोद कांबली की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. एक दौर था जब उनकी तुलना सचिन तेंदुलकर से होती थी लेकिन आज वह क्रिकेट की चमक-दमक से दूर एक गुमनाम जिंदगी जी रहे हैं.
मुंबई का शिवाजी पार्क कई महान क्रिकेटरों की जन्मभूमि रहा है और विनोद कांबली भी उन्हीं में से एक थे. बचपन से ही उनके खेल में अलग तरह का आत्मविश्वास और आक्रामकता दिखती थी. उन्होंने उसी स्कूल और उसी कोच के साथ क्रिकेट सीखा, जहां सचिन तेंदुलकर ने अपने खेल को निखारा.
स्कूल क्रिकेट में कांबली और सचिन की जोड़ी ने इतिहास रच दिया था. दोनों के बीच हुई 664 रनों की साझेदारी आज भी याद की जाती है. इस मैच में कांबली ने नाबाद 349 रन बनाए थे, जिसने उन्हें रातोंरात स्टार बना दिया.
घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छे प्रदर्शन के बाद विनोद कांबली को भारतीय टीम में जगह मिली. उन्होंने अपने शुरुआती टेस्ट मैचों में ही दोहरे शतक लगाकर सबको चौंका दिया. बहुत कम समय में उन्होंने 1000 टेस्ट रन पूरे कर लिए, जो उस दौर में एक बड़ा रिकॉर्ड था.
उनका टेस्ट औसत 50 से ऊपर रहा, जो यह साबित करता है कि उनके पास कितनी जबरदस्त प्रतिभा थी. वनडे क्रिकेट में भी उन्होंने कई अहम पारियां खेलीं और ऐसा लगा कि भारतीय टीम को एक और बड़ा सितारा मिल गया है.
हालांकि, जितनी तेजी से कांबली का नाम ऊपर गया, उतनी ही तेजी से उनका करियर नीचे भी आया. शॉर्ट बॉल के खिलाफ उनकी कमजोरी, फिटनेस पर ध्यान न देना और मैदान के बाहर का व्यवहार उनकी सबसे बड़ी परेशानी बन गया. 1996 विश्व कप के बाद उनका प्रदर्शन लगातार गिरने लगा. चयनकर्ताओं का भरोसा धीरे-धीरे टूटता गया और टीम में उनकी जगह खतरे में पड़ गई. कुछ भावुक पल और विवादित बयान भी उनके करियर पर भारी पड़े.
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से बाहर होने के बाद विनोद कांबली ने फिल्मों, टीवी और कमेंट्री जैसे क्षेत्रों में भी कोशिश की लेकिन उन्हें दोबारा वही पहचान नहीं मिल पाई. समय के साथ वह सुर्खियों से दूर होते चले गए और आज उनकी जिंदगी काफी हद तक गुमनामी में गुजर रही है.