यूरोप के कई हिस्सों में साल के अधिकतर महीनों में बहुत ठंड पड़ती है. पुराने ज़माने में जब घरों में नल का पानी बेहद ठंडा रहता था और गर्म पानी (गिज्जर) की व्यवस्था नहीं थी, तब शौच के बाद ठंडे पानी का इस्तेमाल करना असहज था. इस कारण वहां सूखे विकल्प के रूप में कागज़ का चलन शुरू हुआ. वहीं भारत एक उष्णकटिबंधीय (गर्म) देश है, जहां पानी का इस्तेमाल सहज रहा है.
भारत में नदियों और जल स्रोतों की हमेशा से प्रचुरता रही है, इसलिए दैनिक कार्यों में पानी का इस्तेमाल स्वाभाविक था. दूसरी ओर, यूरोप में 19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति के बाद कागज़ बनाना काफी आसान और सस्ता हो गया. इसके बाद टॉयलेट पेपर को एक सुलभ और आधुनिक स्वच्छता साधन के रूप में अपनाया गया.
यूरोप के घरों और सीवर पाइपलाइनों को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि टॉयलेट पेपर पानी में आसानी से घुलकर फ्लश हो जाता है. उनके बाथरूम के फर्श पर पानी का निकास (Floor Drain) नहीं होता, जिससे बाथरूम हमेशा सूखा रहता है. इसके उलट, भारतीय बाथरूम में फर्श पर पानी बहने और निकलने की पूरी व्यवस्था होती है.
भारतीय संस्कृति में पानी से धोने को ही पूर्ण सफाई और शुद्धता माना जाता है. जबकि पश्चिमी देशों में लंबे समय तक यह सोच रही कि सूखापन बैक्टीरिया से बचाता है.
हालांकि, अब पश्चिमी देशों में भी 'बिडेट' (Bidet) या जेट स्प्रे का उपयोग तेज़ी से बढ़ रहा है, क्योंकि डॉक्टर भी पानी से सफाई को त्वचा और स्वास्थ्य के लिए बेहतर मानते हैं.