नई दिल्ली: होली का त्योहार रंगों, खुशियों और प्रेम का पर्व है, जो इस बार 4 मार्च 2026 को मनाया जाएगा. बाजारों में रंग, गुजिया और पिचकारियां बिक रही हैं और नए-नए कपल्स अपनी पहली होली को लेकर काफी उत्साहित हैं. लेकिन भारतीय परंपराओं में एक खास रिवाज है - शादी के बाद लड़कियां अपनी पहली होली ससुराल में नहीं मनातीं, बल्कि मायके में जाकर मनाती हैं. यह सदियों पुरानी परंपरा आज भी कई परिवारों में निभाई जाती है. आखिर इसके पीछे क्या वजह है? चलिए जानते हैं.
हिंदू मान्यताओं के अनुसार होली का मुख्य हिस्सा होलिका दहन है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. लेकिन जलती हुई होलिका की अग्नि को लेकर कुछ नियम हैं. नवविवाहित बहू के लिए ससुराल में होलिका दहन देखना अशुभ माना जाता है. कई जगहों पर इसे होलिका की चिता कहा जाता है और शादी जैसे मांगलिक कार्य के बाद चिता जैसी चीज देखना ठीक नहीं समझा जाता. इससे वैवाहिक जीवन में कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है या घर में अशांति आ सकती है.
एक प्रमुख मान्यता सास-बहू के रिश्ते से जुड़ी है. कहा जाता है कि अगर सास और नई बहू एक साथ जलती होली देखें, तो उनके बीच कड़वाहट या मनमुटाव आ सकता है. अग्नि का प्रभाव बहुत तेज होता है, इसलिए रिश्तों में खटास से बचने के लिए बहू को मायके भेज दिया जाता है. इससे सास-बहू का रिश्ता शुरू से ही मजबूत और सौहार्दपूर्ण रहता है.
इसके अलावा यह भी विश्वास है कि पहली होली मायके में मनाने से आने वाली संतान स्वस्थ, सौभाग्यशाली और मजबूत होती है. यह वंश वृद्धि और परिवार की खुशहाली से जुड़ा माना जाता है. साथ ही मायके जाना भावनात्मक रूप से भी फायदेमंद होता है - नई दुल्हन को अपने माता-पिता, भाई-बहनों के साथ समय बिताने का मौका मिलता है, जो शादी के बाद के तनाव को कम करता है.
यह परंपरा बेटी के प्रति मायके का प्यार और सम्मान दिखाती है, कि शादी के बाद भी उसका पूरा हक मायके पर बना रहता है. कई परिवारों में पति भी मायके जाकर पत्नी के साथ होली मनाते हैं, जिससे कपल की बॉन्डिंग और मजबूत होती है. यह रिवाज सिर्फ अंधविश्वास नहीं, बल्कि रिश्तों को संवारने और नकारात्मक ऊर्जा से बचाने का तरीका है. आज के दौर में कुछ लोग इसे फॉलो करते हैं, तो कुछ नहीं, लेकिन यह भारतीय संस्कृति की खूबसूरती दिखाता है कि त्योहार सिर्फ खुशी नहीं, बल्कि परिवार और परंपराओं का भी सम्मान करते हैं.