भारत में दवाओं को लेकर आम धारणा रही है कि महंगी ब्रांडेड दवाएं ही ज्यादा असरदार होती हैं. लेकिन एक नई स्टडी ने इस सोच को सीधी चुनौती दी है. अध्ययन में पाया गया है कि भारत में मिलने वाली जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं जितनी ही प्रभावी हैं, जबकि उनकी कीमत कई मामलों में 10 से 14 गुना तक कम है.
यह अध्ययन Citizen’s Generic versus Branded Drugs Quality Project के तहत किया गया, जिसे Mission for Ethics and Science in Healthcare (MESH) ने आयोजित किया. इसमें 22 जरूरी दवाओं के 131 सैंपल की जांच की गई. ये सैंपल बड़ी ब्रांडेड कंपनियों, ब्रांडेड जेनेरिक, सरकारी जन औषधि केंद्र और ट्रेड जेनेरिक समेत सात अलग-अलग स्रोतों से लिए गए थे.
जांच में सभी दवाएं इंडियन फार्माकोपिया के मानकों पर खरी उतरीं. दवाओं की मात्रा, घुलने की क्षमता और अशुद्धियों के स्तर में कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया. औसतन दवा की गुणवत्ता 99.45 प्रतिशत रही. ब्रांडेड दवाओं में यह 101.35 प्रतिशत और जेनेरिक में 99.10 प्रतिशत पाई गई, जो पूरी तरह मानकों के भीतर है.
जहां गुणवत्ता लगभग समान रही, वहीं कीमत में बड़ा फर्क सामने आया. ब्रांडेड दवाओं की औसत कीमत 11.17 रुपये प्रति टैबलेट रही, जबकि जन औषधि की वही दवाएं करीब 2.40 रुपये में मिलती हैं. लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में यह अंतर मरीजों पर भारी बोझ बन जाता है. उदाहरण के तौर पर, लिवर की बीमारी में इस्तेमाल होने वाली UDCA दवा का सालाना खर्च ब्रांडेड में 22 हजार रुपये से ज्यादा हो सकता है, जबकि जन औषधि में यह 6 हजार रुपये से कम है.
हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. सिरिएक एबी फिलिप्स ने बताया कि एक ऑटो चालक महंगी दवा नहीं खरीद पाने के कारण खुराक छोड़ता रहा, जिससे उसकी हालत बिगड़ गई और उसे कोमा में अस्पताल पहुंचाना पड़ा. इलाज में करीब 80 हजार रुपये खर्च हुए.
डॉ. फिलिप्स का कहना है कि जेनेरिक दवाओं को कमतर बताने की सोच मार्केटिंग से पैदा हुई है, न कि वैज्ञानिक तथ्यों से. यह अध्ययन दिखाता है कि सस्ती दवाएं भी उतनी ही असरदार हैं और सही जानकारी से लाखों मरीजों का इलाज सस्ता और आसान हो सकता है.