नई दिल्ली: भारतीय रसोई में दाल रोज का भोजन है, लेकिन दाल पकाते समय ऊपर दिखने वाला सफेद झाग अक्सर भ्रम और डर की वजह बन जाता है. सोशल मीडिया पर इसे यूरिक एसिड, गठिया और धीमे जहर से जोड़कर पेश किया जाता है. इसी भ्रम को दूर करते हुए रायपुर के मशहूर ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. जयेश शर्मा ने वैज्ञानिक आधार पर बताया है कि यह झाग क्यों बनता है और सेहत के लिए इसका असली असर क्या है.
दाल उबालने पर जो सफेद झाग ऊपर तैरता दिखता है, वह दाल में मौजूद प्रोटीन, स्टार्च और सैपोनिन नामक प्राकृतिक तत्वों से बनता है. सैपोनिन पौधों में पाया जाने वाला एक कंपाउंड है, जो उन्हें कीट और बैक्टीरिया से बचाता है. पानी और गर्मी के संपर्क में आने पर यह साबुन जैसी प्रतिक्रिया करता है, जिससे झाग बनता है. यह पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया है.
डॉ. जयेश शर्मा के अनुसार, इस झाग को जहर कहना बिल्कुल गलत है. सीमित मात्रा में सैपोनिन शरीर के लिए फायदेमंद भी हो सकता है. इसमें एंटी इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं और यह कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक माना जाता है. सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के लिए यह झाग किसी भी तरह का खतरा नहीं बनता और न ही यह यूरिक एसिड बढ़ाता है.
डॉ. शर्मा बताते हैं कि जिन लोगों को IBS या पाचन से जुड़ी गंभीर समस्या है, उनमें सैपोनिन की अधिक मात्रा कभी कभी आंतों में जलन पैदा कर सकती है. ऐसे मामलों में दाल का स्वाद कड़वा लग सकता है या हल्की असहजता हो सकती है. हालांकि यह स्थिति बहुत सीमित लोगों में देखी जाती है और इसे गंभीर बीमारी से जोड़ना सही नहीं है.
कई लोगों का मानना है कि प्रेशर कुकर में झाग बाहर नहीं निकलता और इससे गैस या पेट फूलने की समस्या होती है. डॉ. शर्मा इस धारणा को मिथक बताते हैं. उनके अनुसार पेट फूलने की असली वजह दाल में मौजूद FODMAPs नामक जटिल शुगर होती है, जो पाचन में देर लगाती है और आंतों में गैस बनाती है.
बेहतर पाचन के लिए डॉ. जयेश शर्मा दाल को पकाने से पहले अच्छी तरह धोने और कुछ घंटों तक भिगोने की सलाह देते हैं. इससे सैपोनिन की मात्रा कम होती है और FODMAPs का टूटना शुरू हो जाता है. प्रेशर कुकर में उच्च तापमान पर दाल पकाने से पाचन आसान होता है और पोषक तत्व भी सुरक्षित रहते हैं. सफेद झाग हटाना पूरी तरह वैकल्पिक है, जरूरी नहीं.