नई दिल्ली: अगर आपको लगता है कि पैसों की चिंता सिर्फ जेब पर असर डालती है, तो नई रिसर्च इस सोच को बदल सकती है. ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों ने पाया है कि लंबे समय तक आर्थिक तंगी झेलने वाले लोगों के दिमाग पर भी इसका गहरा असर पड़ता है. अध्ययन के अनुसार लगातार वित्तीय तनाव मस्तिष्क की कार्यक्षमता को कमजोर कर सकता है और उम्र बढ़ने के साथ संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट को तेज कर सकता है.
यह अध्ययन ब्रिटेन के 2,759 लोगों पर किया गया, जिनका जन्म 1946 में हुआ था. शोधकर्ताओं ने युवावस्था से लेकर 70 वर्ष की उम्र तक उनकी आर्थिक स्थिति और स्वास्थ्य का रिकॉर्ड रखा. जिन लोगों ने लंबे समय तक बिल भरने और आय के प्रबंधन में कठिनाई झेली, उनमें उम्र बढ़ने के साथ मस्तिष्क के सिकुड़ने और संज्ञानात्मक क्षमता घटने के अधिक संकेत मिले.
अध्ययन में पाया गया कि 20, 30, 40 और 50 की उम्र के दौरान लगातार आर्थिक कठिनाइयों का सामना करने वाले लोग 53 वर्ष की उम्र तक संज्ञानात्मक परीक्षणों में अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन करते थे. 69 से 71 वर्ष की आयु में उनके ब्रेन स्कैन में मस्तिष्क स्वास्थ्य भी कम बेहतर पाया गया. यह संबंध शिक्षा, बचपन की परिस्थितियों और अन्य सामाजिक कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी बना रहा.
रिसर्च के अनुसार लंबे समय तक वित्तीय तनाव का प्रभाव पुरुषों में अधिक देखा गया. अध्ययन में शामिल पुरुषों ने महिलाओं की तुलना में संज्ञानात्मक परीक्षणों में कमजोर प्रदर्शन किया. शोधकर्ताओं का मानना है कि धूम्रपान, शराब सेवन जैसी जीवनशैली और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी का दबाव इस अंतर का एक कारण हो सकता है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि लगातार पैसों की चिंता शरीर में सूजन बढ़ाने वाली जैविक प्रक्रियाओं को सक्रिय कर सकती है, जिससे मस्तिष्क तेजी से बूढ़ा होने लगता है. इसके अलावा आर्थिक तनाव दिमाग पर लगातार मानसिक बोझ डालता है, जिससे सोचने, निर्णय लेने और नई जानकारी याद रखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.
शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि लंबे समय तक आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे लोगों को बेहतर सामाजिक और आर्थिक सहयोग मिले, तो भविष्य में संज्ञानात्मक गिरावट और डिमेंशिया के मामलों को कम किया जा सकता है. अध्ययन यह भी बताता है कि आर्थिक सुरक्षा केवल जीवन स्तर ही नहीं, बल्कि मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण है.