बढ़ती उम्र के साथ दिमाग को स्वस्थ बनाए रखने को लेकर एक नई स्टडी में महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि मिडिल एज में तीन प्रमुख जोखिम कारकों धूम्रपान, हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) और डायबिटीज से बचाव किया जाए, तो व्यक्ति डिमेंशिया से औसतन लगभग 13 वर्ष अधिक समय तक सुरक्षित रह सकता है. अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों में ये तीनों जोखिम कारक नहीं थे, वे लगभग 30 वर्ष तक डिमेंशिया मुक्त रहे, जबकि इन जोखिमों वाले लोगों में यह अवधि औसतन 17 वर्ष रही.
स्टडी के वरिष्ठ शोधकर्ता और NYU Langone Optimal Aging Institute के निदेशक डॉ. जोसेफ कोरेश के अनुसार, मिडिल एज में इन जोखिम कारकों को नियंत्रित करना मस्तिष्क की दीर्घकालिक सेहत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि 55 वर्ष की आयु के बाद बड़ी आबादी में डिमेंशिया का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए समय रहते बचाव जरूरी है. शोध के मुताबिक, धूम्रपान, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे मस्तिष्क तक रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है.
डिमेंशिया कोई एक बीमारी नहीं, बल्कि कई लक्षणों का समूह है, जो अलग-अलग कारणों से विकसित हो सकता है. इनमें वैस्कुलर डिमेंशिया दूसरा सबसे सामान्य प्रकार है, जो मस्तिष्क में रक्त प्रवाह कम होने से होता है. वहीं, शोधकर्ताओं का मानना है कि कमजोर रक्त संचार अल्जाइमर रोग के विकास में भी भूमिका निभा सकता है. हाई ब्लड प्रेशर धमनियों को नुकसान पहुंचाता है, डायबिटीज रक्त में अधिक शर्करा के कारण रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करती है, जबकि धूम्रपान इन दोनों समस्याओं का खतरा और बढ़ा देता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इन जोखिमों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. धूम्रपान छोड़ना, शराब का सीमित सेवन, संतुलित आहार अपनाना, नमक और चीनी की मात्रा नियंत्रित रखना, नियमित एरोबिक व्यायाम करना और स्वस्थ वजन बनाए रखना हाई ब्लड प्रेशर तथा डायबिटीज से बचाव में मदद कर सकता है. इन उपायों से मस्तिष्क और रक्त वाहिकाओं दोनों की सेहत बेहतर बनी रह सकती है.
अध्ययन में यह भी पाया गया कि महिलाओं और पुरुषों में डिमेंशिया का जोखिम समान नहीं है. महिलाओं में डिमेंशिया विकसित होने से पहले की औसत अवधि पुरुषों की तुलना में अधिक रही, हालांकि उनकी कुल जीवनकाल जोखिम अधिक मानी जाती है क्योंकि वे औसतन अधिक समय तक जीवित रहती हैं. वहीं, नस्लीय आधार पर भी अंतर देखा गया, जहां अश्वेत प्रतिभागियों में लक्षण अपेक्षाकृत जल्दी दिखाई दिए. शोधकर्ताओं का कहना है कि विशेष रूप से अधिक जोखिम वाले समूहों में समय रहते रोकथाम और नियमित स्वास्थ्य जांच पर जोर देना भविष्य में डिमेंशिया के मामलों को कम करने में मददगार हो सकता है.