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Inspiring Journey: मां ने घरों में बर्तन मांजकर पढ़ाया, आज बच्चों का भविष्य संवार रहे नेशनल अवॉर्डी टीचर

ओडिशा के रायगड़ा जिले के कोटापेटा गांव से आने वाले द्विती चंद्र साहू का जीवन संघर्ष और संकल्प की मिसाल है. बचपन में पिता का साया छिन गया और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कठिन थी.

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Edited By: Reepu Kumari
Inspiring Journey: मां ने घरों में बर्तन मांजकर पढ़ाया, आज बच्चों का भविष्य संवार रहे नेशनल अवॉर्डी टीचर
Courtesy: Pinterest

Inspiring Journey: कभी घर में खाने के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे और पढ़ाई जारी रखना भी किसी चुनौती से कम नहीं था. ओडिशा के रायगड़ा जिले के छोटे से गांव कोटापेटा के द्विती चंद्र साहू ने ऐसा दौर देखा, जब परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. बचपन में ही पिता का निधन हो गया. इसके बाद उनकी मां ने बेटे की पढ़ाई के लिए दूसरों के घरों में बर्तन मांजे और हर मुश्किल के बीच उनका साथ दिया.

संघर्ष के बीच साहू ने भी हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए अखबार बेचने का काम किया. जिस इलाके में बिजली और इंटरनेट जैसी सुविधाएं भी आसानी से उपलब्ध नहीं थीं, वहीं से उन्होंने शिक्षा का सफर आगे बढ़ाया. समय के साथ यही संघर्ष उनकी ताकत बना. आगे चलकर उन्होंने शिक्षक के रूप में बच्चों को पढ़ाने के ऐसे तरीके अपनाए, जिन्होंने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई.

भूख के बीच भी नहीं टूटा पढ़ाई का हौसला

द्विती चंद्र साहू का बचपन आर्थिक तंगी में गुजरा. कई बार उन्हें खाली पेट रात बितानी पड़ी, लेकिन पढ़ाई को लेकर उनका हौसला कमजोर नहीं हुआ. पिता के निधन के बाद मां ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली. बेटे को पढ़ाने के लिए उन्होंने दूसरों के घरों में काम किया. साहू ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनकी मां ने उन्हें शिक्षा दिलाने के लिए बर्तन तक मांजे.

पढ़ाई के साथ अखबार बेचकर जुटाया खर्च

साहू ने ओडिशा के दुर्गम इलाके में रहकर पढ़ाई की, जहां बुनियादी सुविधाओं की कमी थी. उन्होंने किसी तरह मैट्रिक की परीक्षा पास की, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए पैसे जुटाना बड़ी चुनौती थी. इसके बाद उन्होंने रोज पैदल चलकर अखबार बेचे. इसी काम से मिलने वाली कमाई से उन्होंने अपनी आगे की शिक्षा का खर्च निकाला. उस समय उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि पढ़ाई आगे कैसे जारी रखी जाए.

पत्रकारिता की पढ़ाई से शिक्षक बनने तक का सफर

संघर्षों के बावजूद साहू ने शिक्षा का रास्ता नहीं छोड़ा. उन्होंने जनजातीय अध्ययन में पीएचडी की पढ़ाई की. साल 1997 से 2001 तक उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की और इसके बाद सरकारी ट्रेनिंग पूरी करके शिक्षक बने. रायगढ़ के सरकारी स्कूल Govt. High School, बिल्लेसू में सेवाएं देते हुए उन्होंने पढ़ाने के पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर बच्चों के लिए नए प्रयोग किए.

इंटरनेट नहीं था तो खुद तलाशा पढ़ाने का रास्ता

दुर्गम इलाके में बिजली और इंटरनेट की सीमित सुविधा के बावजूद साहू ने ICT को पढ़ाई से जोड़ा. वे कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में जाकर शैक्षणिक वीडियो डाउनलोड करते और उन्हें अपने स्कूल के बच्चों को पढ़ाने में इस्तेमाल करते. उन्होंने एजुकेशनल गेम्स तैयार किए, YouTube चैनल शुरू किया और सॉफ्टकॉपी PDF सामग्री भी तैयार की. उनका उद्देश्य था कि संसाधनों की कमी बच्चों की सीखने की क्षमता के रास्ते में बाधा न बने.

पत्रकारिता के अनुभव से कक्षा में किए नए प्रयोग

साहू ने पत्रकारिता से मिले अनुभव को भी शिक्षण में इस्तेमाल किया. उन्होंने अमा बैंक, बाल अदालत, आर्ट, पपेट शो और पेंटिंग जैसी गतिविधियों को पढ़ाई से जोड़ा. आदिवासी भाषाओं के शब्दकोशों और ओडिया व कोवी भाषाओं की द्विभाषी कहानी की किताबों से बाइलिंगुअल एजुकेशन को बढ़ावा दिया. गणित समझाने के लिए कंचों और क्रिएटिव लर्निंग के लिए फ्लैशकार्ड का इस्तेमाल किया.

बच्चों के लिए बनाया सीखने का अलग माहौल

द्विती साहू ने 'परिमाल पाठशाला' के जरिए 'फंडे' शनिवार की शुरुआत की, जिसमें साफ सफाई और सुरक्षा पर ध्यान दिया गया. उन्होंने 'पिटारा शिक्षण पेटी' भी शुरू की, जिसमें रीसाइकल की गई चीजों से कम लागत वाले शैक्षणिक उपकरण तैयार किए जाते हैं. इसके अलावा स्कूल में कोऑपरेटिव स्टोर, आदिवासी म्यूजियम, MLE रीडिंग कॉर्नर और क्राफ्ट कॉर्नर बनाया गया. शिक्षा और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें 'नेशनल अवॉर्ड फॉर टीचर्स 2024' से सम्मानित किया.