उम्मुल खेर को ऑस्टियोजेनेसिस इमपरफेक्टा नाम की दुर्लभ बीमारी थी. इसे फ्रेजाइल जोन डिसऑर्डर भी कहा जाता है. इस बीमारी के कारण उनकी हड्डियां बेहद कमजोर थीं और मामूली चोट से भी टूटने का खतरा रहता था.
खेर ने जीवन के एक बड़े हिस्से को प्लास्टर के साथ बिताया. शारीरिक परेशानियों के बावजूद उम्मुल ने शिक्षा को अपनी ताकत बनाया. उनके लिए बीमारी रुकावट जरूर थी, लेकिन मंजिल तक पहुंचने की वजह नहीं बनी.
आर्थिक परिस्थितियां भी उनके लिए आसान नहीं थीं. उन्होंने दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन इलाके के पास एक झुग्गी बस्ती में अपने जीवन का कुछ समय गुजारा. परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए उन्होंने स्कूल के समय से ही दूसरे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया. कम उम्र में जिम्मेदारियां संभालने के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी. आर्थिक अभाव ने उनके सामने मुश्किलें खड़ी कीं, लेकिन यही अनुभव उनके भीतर आगे बढ़ने का संकल्प मजबूत करता गया.
उम्मुल ने आगे की पढ़ाई के दौरान अपने लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए. उन्होंने क्लीनिकल साइकोलॉजी के बजाय JNU से इंटरनेशनल स्टडीज की पढ़ाई करने का निर्णय लिया. इसी दौरान उन्हें JRF फेलोशिप भी मिली. फेलोशिप ने उनकी पढ़ाई और UPSC की तैयारी के लिए आर्थिक सहारा दिया. इस तरह उन्होंने अपने समय और संसाधनों को भविष्य के लक्ष्य के हिसाब से व्यवस्थित किया.
उम्मुल के संघर्ष का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने करीब 10 साल तक चलने-फिरने के लिए भारी प्लास्टिक ब्रेसेस का इस्तेमाल किया. उनके मुताबिक इन ब्रेसेस की वजह से काफी दर्द होता था और त्वचा तक छिल जाती थी. इसके बावजूद उन्होंने कॉलेज जाना और अपनी पढ़ाई जारी रखना नहीं छोड़ा. शारीरिक तकलीफ के बीच उनकी नियमितता और अनुशासन उनके सफर का अहम हिस्सा बना रहा. लगातार मेहनत और तैयारी के बाद उम्मुल खेर ने अपने पहले ही प्रयास में UPSC परीक्षा पास कर ली. इसके बाद वह 2017 बैच की इंडियन रेवेन्यू सर्विस अधिकारी बनीं.
उनके सफर में बीमारी से लेकर आर्थिक तंगी और शारीरिक तकलीफ तक कई चुनौतियां रहीं. यहां तक कि साउथ कोरिया में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए वीजा नहीं मिलने जैसी स्थिति का भी उन्होंने सामना किया. इसके बावजूद उन्होंने अपने प्रयास जारी रखे.