नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बीजिंग में हुई अहम बैठक के दौरान एक ऐसा शब्द चर्चा में आ गया, जिसने दुनिया का ध्यान खींच लिया. शी जिनपिंग ने बातचीत के दौरान 'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप' का जिक्र करते हुए अमेरिका को टकराव से बचने का संदेश दिया. इस बयान को चीन की रणनीतिक सोच और अमेरिका के साथ उसके रिश्तों के भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक जिनपिंग ने ट्रंप से कहा कि क्या चीन और अमेरिका इस तथाकथित 'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप' से ऊपर उठकर सहयोग का नया मॉडल बना सकते हैं. उन्होंने कहा कि दोनों देश मिलकर वैश्विक चुनौतियों से निपट सकते हैं और दुनिया में स्थिरता ला सकते हैं.
'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप' शब्द को ग्राहम एलिसन ने लोकप्रिय बनाया था. उन्होंने इसे प्राचीन यूनानी इतिहासकार थ्यूसीडाइड्स के विचारों से जोड़ा. थ्यूसीडाइड्स ने करीब 2500 साल पहले पेलोपोनेसियन युद्ध का अध्ययन किया था. उनका निष्कर्ष था कि एथेंस की बढ़ती ताकत से स्पार्टा डर गया था और यही युद्ध की बड़ी वजह बनी.
इसी सिद्धांत को आधुनिक दौर में अमेरिका और चीन पर लागू किया जा रहा है. जानकारों का मानना है कि चीन तेजी से उभरती ताकत है, जबकि अमेरिका लंबे समय से दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्ति रहा है. ऐसे में दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ना स्वाभाविक माना जा रहा है.
दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध, टैरिफ, सेमीकंडक्टर तकनीक, ताइवान मुद्दा, साइबर सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और दक्षिण चीन सागर में सैन्य गतिविधियों को लेकर तनाव लगातार बढ़ा है. ट्रंप के कार्यकाल में यह तनाव और ज्यादा बढ़ा.
विशेषज्ञों का कहना है कि शी जिनपिंग का यह बयान केवल शांति की अपील नहीं बल्कि दुनिया को यह संदेश भी है कि चीन अब खुद को अमेरिका के बराबर की ताकत मानता है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दोनों महाशक्तियां इतिहास की गलती दोहराएंगी या नया रास्ता चुनेंगी.