नई दिल्ली: BRICS के 11 सदस्य देशों में रूस, सऊदी अरब, ईरान और UAE जैसे बड़े तेल उत्पादक देश शामिल हैं, वहीं भारत और चीन दुनिया के बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में गिने जाते हैं. यही वजह है कि BRICS का प्रभाव ग्लोबल एनर्जी मार्केट में तेजी से बढ़ा है. रिपोर्ट के मुताबिक, BRICS+ देश दुनिया के कच्चे तेल उत्पादन के करीब 41 से 47 फीसदी हिस्से से जुड़े हैं, जबकि इनके पास दुनिया के प्रमाणित नेचुरल गैस भंडार का करीब आधा हिस्सा है.
लेकिन इतनी बड़ी ऊर्जा ताकत के बावजूद BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने अलग-अलग हितों को एक मंच पर लाना है. रूस, सऊदी अरब और ईरान जैसे तेल निर्यातक देश ज्यादा कीमत और अधिक राजस्व चाहते हैं, जबकि भारत और चीन जैसे आयात पर निर्भर देश सस्ती और स्थिर ऊर्जा सप्लाई चाहते हैं.
BRICS के पास ऊर्जा संसाधनों की बड़ी ताकत है, लेकिन यह OPEC+ जैसा तेल कार्टेल नहीं है. इसके पास ऐसा मजबूत संस्थागत ढांचा नहीं है, जिसके जरिए सदस्य देश संकट के समय तेल की सप्लाई और कीमतों को मिलकर नियंत्रित कर सकें.
लंदन यूनिवर्सिटी के SOAS साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के बुर्जिन वाघमार के मुताबिक, ऊर्जा संकट या वैश्विक संसाधनों की कमी के समय BRICS के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करना मुश्किल होगा. इसकी वजह रियल टाइम सप्लाई को संभालने वाला संस्थागत ढांचा, साझा राजनीतिक इच्छाशक्ति और जरूरी भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है.
नई दिल्ली में BRICS Summit ऐसे समय हो रहा है, जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा हुआ है. ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल के सैन्य हमलों के बाद होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली शिपिंग को लेकर चिंता बढ़ी है. इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से पहले दुनिया की कुल तेल और गैस सप्लाई का करीब पांचवां हिस्सा गुजरता था.
गुरुवार को ब्रेंट फ्यूचर्स की कीमत 102.07 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. होर्मुज स्ट्रेट में लंबे समय तक रुकावट रहने की स्थिति में भारत और चीन जैसे ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर बड़ा दबाव पड़ सकता है.
इस संकट का असर BRICS के अंदर भी दिखाई दे रहा है. UAE और ईरान के बीच तनाव के चलते दोनों देशों के बीच व्यापार और वित्तीय लेन-देन को लेकर भी मुश्किलें पैदा हुई हैं. ऐसे में Summit के संयुक्त घोषणा-पत्र में पश्चिम एशिया के तनाव पर सभी सदस्य देशों की सहमति बनाना एक बड़ी चुनौती हो सकती है.
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने माना है कि UAE और ईरान के मतभेदों का संयुक्त घोषणा-पत्र पर नकारात्मक असर पड़ा है. हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि BRICS नेता ऐसी भाषा पर सहमत हो सकते हैं, जिसे दोनों पक्ष स्वीकार करें.