अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां अत्याधुनिक हथियारों और अरबों डॉलर के सैन्य अभियानों के बावजूद निर्णायक बढ़त किसी भी पक्ष को मिलती नहीं दिख रही. अमेरिका ने ईरान के सैन्य ढांचे, मिसाइल ठिकानों और रणनीतिक परिसंपत्तियों को निशाना बनाने के लिए कई बड़े अभियान चलाए, लेकिन विभिन्न रिपोर्टों और दावों के अनुसार ईरान की मिसाइल क्षमता और भूमिगत सैन्य नेटवर्क अब भी सक्रिय बने हुए हैं.
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान ने वर्षों में अपने महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को गहरी सुरंगों और भूमिगत संरचनाओं में विकसित किया है. यही वजह है कि लगातार हवाई हमलों के बाद भी कई अहम ठिकानों को दोबारा सक्रिय किए जाने के दावे सामने आ रहे हैं.
ईरान की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति उसका विशाल मिसाइल भंडार माना जाता है. उसके पास कम दूरी, मध्यम दूरी और लंबी दूरी तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों का बड़ा संग्रह है. फतेह, जुल्फेकार, शहाब, एमाद, खैबर शिकन और सेजिल जैसी मिसाइलें उसकी रणनीतिक क्षमता का हिस्सा हैं. इसके अलावा क्रूज मिसाइलों और ड्रोन तकनीक पर भी ईरान ने लगातार निवेश किया है. हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम को लेकर भी ईरान समय-समय पर दावे करता रहा है. मध्य पूर्व में अमेरिका के कई सैन्य ठिकाने लगातार खतरे के दायरे में बताए जा रहे हैं. क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के साथ जॉर्डन, इराक, कुवैत और अन्य स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है. अमेरिका ने भी अपने सैन्य ठिकानों की रक्षा के लिए अतिरिक्त संसाधन तैनात किए हैं. हालांकि दोनों पक्षों की ओर से कई दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है.
विश्लेषकों के अनुसार यह संघर्ष अब केवल हवाई हमलों तक सीमित नहीं रह गया है. ईरान कम लागत वाले ड्रोन, मिसाइलों और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों के जरिए दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है, जबकि अमेरिका अपनी तकनीकी बढ़त और सटीक हमलों के जरिए सैन्य बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहा है. इससे युद्ध का स्वरूप और अधिक जटिल होता जा रहा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ईरान पर दबाव बनाए रखने की बात कही है, वहीं ईरान भी अपने सैन्य संसाधनों और जवाबी क्षमता को मजबूत बताता रहा है. मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि दोनों देशों के बीच तनाव जल्द समाप्त होने के बजाय लंबे समय तक जारी रह सकता है. ऐसे में पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक भू-राजनीतिक संतुलन पर इस संघर्ष का व्यापक प्रभाव पड़ने की आशंका बनी हुई है.