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तालिबान ने अफगानिस्तान में लागू की वर्ण व्यवस्था, मुल्ला और मौलवी बने सर्वशक्तिमान; अपराध करने पर कोर्ट भी नहीं सुना पाएगी सजा

तालिबान के नए क्रिमिनल प्रोसीजर कोड ने अफगानिस्तान में आक्रोश पैदा किया है. कानून समाज को चार वर्गों में बांटता है, गुलामी को मान्यता देता है और धार्मिक मौलवियों को सजा से लगभग मुक्त कर देता है.

Kanhaiya Kumar Jha
तालिबान ने अफगानिस्तान में लागू की वर्ण व्यवस्था, मुल्ला और मौलवी बने सर्वशक्तिमान; अपराध करने पर कोर्ट भी नहीं सुना पाएगी सजा
Courtesy: Gemini AI

नई दिल्ली: तालिबान शासित अफगानिस्तान में लागू किए गए नए क्रिमिनल प्रोसीजर कोड फॉर कोर्ट्स ने देश और दुनिया में गहरी चिंता पैदा कर दी है. इस कानून पर मानवाधिकार संगठनों, पूर्व सरकारी अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने तीखी आपत्ति जताई है. आलोचकों का कहना है कि यह कोड न्याय की जगह असमानता को मजबूत करता है. कानून में समाज को वर्गों में बांटना, गुलामी का उल्लेख और कठोर सजाओं का प्रावधान शामिल है.

तालिबान के नए कोड का अनुच्छेद 9 अफगान समाज को चार श्रेणियों में बांटता है. सबसे ऊपर धार्मिक विद्वान यानी उलमा रखे गए हैं. इसके बाद कुलीन वर्ग, मध्य वर्ग और सबसे नीचे निम्न वर्ग है. आलोचकों के अनुसार यह व्यवस्था कानून के सामने समानता के सिद्धांत को खत्म कर देती है. अपराध की गंभीरता से ज्यादा आरोपी की सामाजिक हैसियत सजा तय करती है.

अपराध और सजा में खुला भेदभाव

मानवाधिकार संगठन रवादारी के अनुसार, यदि कोई मौलवी अपराध करता है तो उसे केवल नसीहत दी जाएगी. अभिजात वर्ग को समन और सलाह, मध्य वर्ग को जेल और निचले वर्ग को जेल के साथ शारीरिक सजा दी जाएगी. एक ही अपराध के लिए अलग-अलग दंड व्यवस्था ने न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इसे संस्थागत भेदभाव बताया जा रहा है.

गुलामी और हिंसा को वैधता

इस कोड में बार-बार “घुलाम” शब्द का प्रयोग किया गया है, जिससे गुलामी को कानूनी पहचान मिलती है. अनुच्छेद 15 में कहा गया है कि अपराधी स्वतंत्र हो या गुलाम, उस पर सजा लागू होगी. कुछ मामलों में सजा लागू करने का अधिकार मालिक या पति को भी दिया गया है. इससे महिलाओं और बच्चों पर हिंसा के वैधीकरण की आशंका बढ़ गई है.

सार्वजनिक सजाएं और डर का माहौल

नए कानून की पृष्ठभूमि में हालिया घटनाएं भी चिंता बढ़ाती हैं. पूर्वी खोस्त प्रांत में एक 13 वर्षीय बच्चे से सार्वजनिक रूप से फांसी दिलवाना इसी व्यवस्था का हिस्सा माना जा रहा है. हजारों लोगों की मौजूदगी में हुई इस घटना की संयुक्त राष्ट्र ने निंदा की थी. 2021 के बाद यह तालिबान द्वारा किया गया ग्यारहवां न्यायिक मृत्युदंड बताया गया है.

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और विरोध

पूर्व अटॉर्नी जनरल मोहम्मद फरीद हमीदी ने इसे सभी नागरिकों को दोषी ठहराने वाला दस्तावेज बताया है. राष्ट्रीय प्रतिरोध मोर्चे और महिला संगठनों ने इसे क्रूरता का वैधीकरण कहा है. संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत रिचर्ड बेनेट ने कोड की समीक्षा की बात कही है. मानवाधिकार संगठन इसके तत्काल निलंबन और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं.