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India Daily

परमाणु टकराव के मुहाने पर दक्षिण एशिया? SIPRI और कार्नेगी की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी के 81 साल बाद दक्षिण एशिया में परमाणु जोखिम फिर चर्चा में है. SIPRI और Carnegie की रिपोर्टें भारत-पाकिस्तान तनाव को गंभीर परमाणु चुनौती मानती हैं.

KanhaiyaaZee
परमाणु टकराव के मुहाने पर दक्षिण एशिया? SIPRI और कार्नेगी की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
Courtesy: AI Generated

नई दिल्ली: 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और 9 अगस्त को नागासाकी पर परमाणु हमलों ने दुनिया को परमाणु हथियारों की भयावह ताकत दिखाई थी. आज दशकों बाद दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के कारण परमाणु जोखिम पर फिर बहस तेज है. SIPRI ने 2026 में दोनों देशों के परमाणु भंडार और उनके आधुनिकीकरण पर चिंता जताई है. वहीं Carnegie Endowment की हालिया रिसर्च भारत-पाकिस्तान को लगातार जोखिम वाले परमाणु फ्लैशपॉइंट के रूप में देखती है.

6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया. तीन दिन बाद 9 अगस्त को नागासाकी को निशाना बनाया गया. इन हमलों के बाद जापान ने 15 अगस्त को आत्मसमर्पण की घोषणा की. मानव इतिहास की इस त्रासदी ने परमाणु हथियारों को लेकर पूरी दुनिया की सोच बदल दी और इसके बाद वैश्विक सुरक्षा में परमाणु प्रतिरोध एक अहम मुद्दा बन गया.

दक्षिण एशिया क्यों बना चिंता का केंद्र?

भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु हथियारों के दौर में कई गंभीर सैन्य संकट आए हैं. 1999 का कारगिल युद्ध, 2001-02 का सैन्य गतिरोध, 2019 का संकट और 2025 का पहलगाम हमले के बाद हुआ संघर्ष इनमें प्रमुख हैं. Carnegie की 2026 की रिसर्च के अनुसार दोनों देशों के बीच तनाव में परमाणु हथियारों की मौजूदगी जोखिम को बढ़ाती है, हालांकि अब तक बड़े स्तर पर परमाणु इस्तेमाल से बचाव हुआ है.

भारत और पाकिस्तान के परमाणु भंडार

SIPRI के जनवरी 2026 के अनुमान के अनुसार भारत के पास करीब 190 और पाकिस्तान के पास करीब 170 परमाणु हथियार हैं. दोनों देशों ने अपने परमाणु हथियारों और उन्हें पहुंचाने वाली प्रणालियों को आधुनिक बनाने का काम जारी रखा है. SIPRI का कहना है कि दुनिया के परमाणु हथियार संपन्न देशों में हथियारों के आधुनिकीकरण के साथ जोखिम भी बढ़ रहा है. भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया संघर्ष ने इस चिंता को और गंभीर बनाया है.

दोनों देशों की परमाणु रणनीति अलग

भारत लंबे समय से नो फर्स्ट यूज यानी NFU नीति पर कायम रहने की बात करता रहा है. इसके तहत भारत परमाणु हथियारों को मुख्य रूप से प्रतिरोध के साधन के तौर पर देखता है. पाकिस्तान ने NFU नीति नहीं अपनाई है और उसकी रणनीति में फुल-स्पेक्ट्रम डिटरेंस की अवधारणा शामिल है. Carnegie के विश्लेषण के मुताबिक यही रणनीतिक अंतर किसी सैन्य संकट के दौरान गलत अनुमान और तेजी से बढ़ते तनाव का खतरा पैदा कर सकता है.

असली खतरा युद्ध से ज्यादा गलत आकलन का?

विशेषज्ञों के मुताबिक दक्षिण एशिया में सबसे बड़ी चिंता केवल परमाणु हथियारों की संख्या नहीं, बल्कि संकट के दौरान गलत फैसले, संचार की कमी और तेजी से बढ़ता सैन्य तनाव है. Carnegie की रिसर्च बताती है कि भारत-पाकिस्तान संकट अक्सर परमाणु युद्ध तक नहीं पहुंचे, लेकिन भविष्य में जोखिम को हल्के में नहीं लिया जा सकता. ऐसे माहौल में संवाद, संकट प्रबंधन और तनाव कम करने की व्यवस्था दोनों देशों के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है.