रणनीतिक खेल या मजबूरी! क्या ईरान के खिलाफ ड्रोन हमलों के लिए बेस देकर अमेरिका का साथ दे रहा पाकिस्तान? बुरा फंसा पाक

एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने ईरान के खिलाफ US ड्रोन हमलों के लिए अपने मिलिट्री बेस का इस्तेमाल करने की इजाजत दी है, जिससे वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं.

@AntiProudPaki x account
Km Jaya

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते ईरान विवाद में पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने हाल ही में ईरान के खिलाफ US ड्रोन हमलों के लिए अपने बेस इस्तेमाल करने दिए, जिससे इलाके का तनाव और बढ़ सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक यह कोई पहली बार की घटना नहीं है. पहले भी इस्लामाबाद पर आरोप लगे हैं कि वह वाशिंगटन के साथ करीबी तालमेल बनाए रखते हुए ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को टारगेट करने वाले US ऑपरेशन को इंटेलिजेंस सपोर्ट दे रहा है. ऐसा लगता है कि इससे पाकिस्तान एक ऐसे स्ट्रेटेजिक ग्रुप में आ गया है जो इलाके की स्थिरता के बजाय शॉर्ट-टर्म फायदे को प्राथमिकता देता है.

रिपोर्ट में और क्या आया सामने?

रिपोर्ट में सऊदी अरब और कतर के साथ 'गाजा बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने के पाकिस्तान के फैसले का भी जिक्र है. कागज पर यह पहल मानवीय और सुलह वाली लगती है लेकिन व्यवहार में यह गाज़ा के बारे में एक सिंबॉलिक डिप्लोमैटिक पहल बन सकती है, जबकि असल में यह उन ताकतों के साथ इनडायरेक्ट कोऑर्डिनेशन बनाए रखती है जो इजराइल को जिम्मेदार ठहराने से बचना चाहती हैं.

एनालिसिस में क्या आया सामने?

एनालिसिस में कहा गया है कि ईरान के खिलाफ पाकिस्तान, सऊदी अरब, इजराइल और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच उभरते तालमेल के पीछे स्ट्रेटेजिक हितों का एक कोल्ड कैलकुलेशन काम कर रहा है.

सऊदी अरब लंबे समय से यमन, इराक और लेबनान जैसे इलाकों में ईरान को अपना मुख्य दुश्मन मानता रहा है और तेहरान की ताकत को कमजोर करना अपने फायदे में समझता है.

क्या है इसकी वजह?

रिपोर्ट के मुताबिक आर्थिक संकट और डिप्लोमैटिक अकेलेपन से जूझ रहा पाकिस्तान, यूनाइटेड स्टेट्स और खाड़ी देशों से आर्थिक मदद, रक्षा सहयोग और राजनीतिक सपोर्ट चाहता है.

US लंबे समय से ईरान को काबू में रखने की स्ट्रैटेजी अपना रहा है, जबकि इजराइल इसे अपने सबसे बड़े क्षेत्रीय दुश्मन को कमजोर करने के मौके के तौर पर देखता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इन डेवलपमेंट्स में अक्सर इस्तेमाल होने वाले प्रिंसिपल्स जैसे इस्लामी एकजुटता, संप्रभुता और मानवीय सरोकार अब चुनिंदा तरीके से लागू होते दिख रहे हैं. इससे न सिर्फ इंटरनेशनल लेवल पर इन देशों की क्रेडिबिलिटी कम हो सकती है, बल्कि अपने ही लोगों के बीच उनका भरोसा भी कम हो सकता है.

एनालिसिस में यह भी कहा गया है कि मौजूदा हालात मुस्लिम-बहुल देशों के लिए एक कठिन परीक्षा है. क्या वे शॉर्ट-टर्म स्ट्रेटेजिक फायदे के लिए रीजनल यूनिटी और स्टेबिलिटी को रिस्क में डालेंगे या यह समझेंगे कि बाहरी मिलिट्री इंटरवेंशन से मिली तुरंत की जीत अक्सर लंबे समय में इनस्टेबिलिटी और क्राइसिस का कारण बनती है.