वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लेने से जुड़े कथित अमेरिकी अभियान “ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व” को लेकर बड़े और चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं. बताया जा रहा है कि इस पूरे ऑपरेशन में मादुरो का सबसे भरोसेमंद सुरक्षा घेरा ही उनके खिलाफ काम करता रहा. यही वजह रही कि अमेरिका को इस मिशन में अपेक्षाकृत कम अड़चनें आईं.
सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने बीते सोमवार को इस ऑपरेशन को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी थी. हालांकि खराब मौसम के कारण अमेरिकी सेना को चार दिन तक इंतजार करना पड़ा. आखिरकार शुक्रवार रात ठीक 10:49 बजे मिशन को अंतिम हरी झंडी मिली और ऑपरेशन को अंजाम देने की तैयारी पूरी कर ली गई.
कहा जा रहा है कि अगस्त महीने से ही CIA की एक छोटी लेकिन खास टीम वेनेजुएला में मौजूद थी. यह टीम मादुरो की दिनचर्या, उनके आने-जाने के रास्तों और सुरक्षा व्यवस्था की बारीक जानकारी जुटा रही थी. एक भरोसेमंद खुफिया संपर्क के जरिए मादुरो की सटीक लोकेशन लगातार अमेरिका तक पहुंचाई जाती रही.
सबसे सनसनीखेज दावा यह है कि मादुरो के निजी बॉडीगार्ड्स भी अमेरिका के लिए काम कर रहे थे. अमेरिकी एजेंसियों ने कथित तौर पर इन बॉडीगार्ड्स को 50 मिलियन डॉलर की मोटी रकम देकर अपने पक्ष में कर लिया. इससे मादुरो की सुरक्षा दीवार अंदर से ही कमजोर हो गई और ऑपरेशन आसान बन गया.
अमेरिकी सेना की एलीट डेल्टा फोर्स ने मादुरो के सुरक्षित ठिकाने की हूबहू नकल तैयार कर कई बार रिहर्सल की, ताकि किसी तरह की चूक न हो. बैकअप के तौर पर कैरेबियन सागर में 11 युद्धपोत तैनात किए गए थे, जिनमें दुनिया का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर USS जेराल्ड आर फोर्ड भी शामिल था.
इस पूरे ऑपरेशन पर तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सीधी नजर बनी रही. फ्लोरिडा स्थित मार-ए-लागो क्लब से वे करीब सात घंटे तक अपने शीर्ष सलाहकारों के साथ लाइव मॉनिटरिंग देखते रहे. साथ ही लगभग 4000 अमेरिकी मरीन सैनिक हाई-अलर्ट पर रखे गए थे, ताकि हालात बिगड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके.
इन दावों के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये खुलासे सही साबित होते हैं, तो यह आधुनिक जासूसी और सत्ता संघर्ष का एक बड़ा उदाहरण होगा.