नई दिल्ली: इजरायल और अमेरिका के रिश्तों में एक नया कूटनीतिक अध्याय जुड़ गया है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने पर सहमति जता दी है. यह मंच शुरुआत में गाजा में संघर्षविराम की निगरानी के लिए बनाया गया था, लेकिन अब इसे वैश्विक विवादों के समाधान की दिशा में एक नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है.
‘बोर्ड ऑफ पीस’ की परिकल्पना शुरुआत में गाजा में हुए संघर्षविराम की निगरानी के लिए की गई थी. लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इसके दायरे को तेजी से बढ़ा दिया. अब यह मंच दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे संघर्षों में मध्यस्थता करने की महत्वाकांक्षा रखता है. इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वैकल्पिक मंच के रूप में भी देखा जा रहा है, जहां निर्णय प्रक्रिया अधिक केंद्रीकृत होगी.
नेतन्याहू के कार्यालय ने पहले बोर्ड की कार्यकारी समिति की संरचना पर आपत्ति जताई थी, खासकर तुर्की की मौजूदगी को लेकर, जो इजरायल का क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी माना जाता है. बावजूद इसके, ट्रंप के औपचारिक निमंत्रण के बाद नेतन्याहू ने बोर्ड में शामिल होने पर सहमति दे दी. उनके कार्यालय की ओर से जारी बयान में इसे इजरायल के लिए रणनीतिक अवसर बताया गया है.
अब तक इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात, मोरक्को, वियतनाम, कजाखस्तान, हंगरी, अर्जेंटीना और बेलारूस बोर्ड में शामिल होने पर सहमत हो चुके हैं. इसके अलावा कनाडा, मिस्र, तुर्की, भारत, रूस और यूरोपीय संघ सहित कई देशों को निमंत्रण भेजा गया है. रूस ने कहा है कि वह प्रस्ताव के सभी पहलुओं का अध्ययन कर रहा है.
बोर्ड का आधिकारिक चार्टर अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन एक मसौदे के अनुसार अधिकांश अधिकार ट्रंप के हाथों में केंद्रित रहेंगे. मसौदे में यह भी उल्लेख है कि एक अरब डॉलर का योगदान देने वाले देशों को स्थायी सदस्यता मिलेगी. इस प्रावधान को लेकर कूटनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह मंच वास्तव में समावेशी होगा.
व्हाइट हाउस ने गाजा के लिए एक अलग कार्यकारी बोर्ड की भी घोषणा की है, जो संघर्षविराम के दूसरे चरण को लागू करेगा. इसमें अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल की तैनाती, हमास को निरस्त्र करना और पुनर्निर्माण जैसे अहम कार्य शामिल हैं. यह बोर्ड गाजा के दैनिक प्रशासन के लिए नियुक्त फिलिस्तीनी तकनीकी विशेषज्ञों की भी निगरानी करेगा.