ब्रह्मा, विष्णु, महेश… जानें उस प्रम्बानन मंदिर का इतिहास, जहां पहुंचे PM मोदी 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंडोनेशिया की यात्रा पर गए. इस दौरान उन्होंने एक खास मंदिर का दौरा किया. प्रम्बानन मंदिर संकुल किसी विरासत से कम नहीं है. .यहां जानें इस मंदिर का इतिहास...

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Shilpa Srivastava

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंडोनेशिया की यात्रा पर गए. इस दौरान उन्होंने एक खास मंदिर का दौरा किया. प्रम्बानन मंदिर संकुल किसी विरासत से कम नहीं है. पीएम मोदी ने इस प्राचीन मंदिर के जीर्णोद्धार की औपचारिक शुरुआत की घोषणा कर दी. इस मंदिर की बात करें तो यह मध्य जावा में जोगजकार्ता शहर से करीब 17 किलोमीटर दूर है. 

इस मंदिर का निर्माण करीब 850 ईस्वी में राजा राकाई पिकातन ने करवाया था. यह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है. यहां भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा को समर्पित मंदिर हैं. एक समय में यहां 240 मंदिर हुआ करते थे.

इस मंदिर को घोषित किया गया विश्व धरोहर:

इसका मुख्य शिव मंदिर करीब 47 मीटर ऊंचा है. मंदिर की दीवारों पर रामायण की पूरी कहानी पत्थर पर उकेरी गई है. इसकी बनावट दक्षिण भारत की पल्लव और चोल शैली से मिलती-जुलती है. सन् 1991 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया था. यह मंदिर सदियों तक उपेक्षित रहा, लेकिन अब भारत की मदद से इसे फिर से नई जान मिल रही है. 


यह परियोजना भारत की एक्ट ईस्ट नीति और महासागर विजन का हिस्सा है. यह दिखाता है कि दोनों देश अब सांस्कृतिक संबंधों को ठोस सहयोग में बदल रहे हैं. प्रम्बानन मंदिर सिर्फ धार्मिक जगह नहीं, बल्कि भारत और इंडोनेशिया के बीच प्राचीन सभ्यतागत जुड़ाव का जीवंत प्रमाण है. यहां तीन मुख्य मंदिर भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा को समर्पित हैं. शिव मंदिर में दुर्गा, गणेश और अगस्त्य की मूर्तियां भी हैं.

परियोजना की शुरुआत कब हुई?

इसकी नींव पिछले साल पड़ चुकी थी. जब राष्ट्रपति प्रबोवो 2025 में भारत आए थे, तब दोनों देशों ने संयुक्त बयान में इस पर सहमति जताई थी. अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इस काम को संभालेगा. ASI को पुराने मंदिरों और इमारतों को दोबारा बनाने का बहुत अच्छा अनुभव है. यह इंडोनेशिया के संस्कृति मंत्रालय के साथ मिलकर काम करेगा.

ASI एनास्टाइलोसिस नाम की खास तकनीक का इस्तेमाल करेगा. इस तकनीक में मंदिर को उसके असली पुराने पत्थरों से ही दोबारा बनाया जाता है, ताकि मूल रूप बरकरार रहे. यह परियोजना 2026-27 में शुरू हो रही है. यह साल इसलिए भी खास है क्योंकि ठीक 100 साल पहले 1927 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जावा और प्रम्बानन मंदिर आए थे.