नई दिल्ली: ईरान के सत्ता गलियारों से आती खबरें दुनिया भर के रणनीतिकारों को चौंका रही हैं. ताजा रिपोर्टों के अनुसार, शक्तिशाली इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने देश की प्रशासनिक और सैन्य व्यवस्था पर अपना पूर्ण वर्चस्व स्थापित कर लिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि वे उदारवादी नेताओं के साथ वार्ता कर रहे हैं, लेकिन ईरानी पक्ष की ओर से इसे पूरी तरह खारिज कर दिया गया है. यह विरोधाभासी स्थिति सवाल उठाती है कि वर्तमान में ईरान की वास्तविक बागडोर आखिर किसके हाथों में है.
राष्ट्रपति पेजेशकियन और बढ़ता राजनीतिक गतिरोध ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, जिन्हें एक उदारवादी छवि का नेता माना जाता है, वर्तमान में पूरी तरह से राजनीतिक गतिरोध में उलझ गए हैं. IRGC ने न केवल सैन्य मोर्चों पर बल्कि सरकार के प्रमुख नीतिगत और प्रशासनिक कार्यों पर भी अपना प्रभुत्व जमा लिया है. पिछले दिनों खुफिया मंत्री के पद पर होसैन देहघन की नियुक्ति का असफल प्रयास इस खींचतान को स्पष्ट करता है. IRGC प्रमुख अहमद वाहिदी के दबाव ने इस नियुक्ति को रद्द करवा दिया, क्योंकि सेना अब प्रशासनिक पदों पर भी नियंत्रण चाहती है.
ईरान में व्याप्त इस राजनीतिक शून्यता का सबसे बड़ा कारण सुप्रीम लीडर की रहस्यमयी अनुपस्थिति है. अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद उनके बेटे मोजतबा खमेनेई को उत्तराधिकारी घोषित किया गया था, लेकिन वे लंबे समय से सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं. उनके संदेश केवल लाइव टीवी पर पढ़कर सुनाए जा रहे हैं. अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के दावों ने इस संशय को और बढ़ा दिया है कि मोजतबा शायद कोमा में हैं या गंभीर रूप से शारीरिक रूप से अक्षम हो चुके हैं.
नेतृत्व के इस संकट का लाभ उठाते हुए वरिष्ठ IRGC अधिकारियों ने एक शक्तिशाली 'सैन्य परिषद' का गठन किया है. यह परिषद अब देश के रोजमर्रा के सभी महत्वपूर्ण और रणनीतिक निर्णय ले रही है. राजनीतिक विश्लेषक इसे 1979 की क्रांति के बाद के उस पुराने सपने की पूर्ति मान रहे हैं, जहां सत्ता का पूर्ण केंद्रीकरण निर्वाचित प्रतिनिधियों के बजाय सेना के हाथों में हो. प्रशासन पर सेना का यह बढ़ता प्रभाव ईरान के भविष्य के लोकतांत्रिक और राजनीतिक ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है.
राष्ट्रपति पेजे शकियन ने निरंतर चेतावनी दी है कि खाड़ी के पड़ोसी देशों के खिलाफ IRGC का आक्रामक रवैया ईरानी अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती सिद्ध होगा. हफ्तों से चल रहे संघर्षों और हथियारों की कमी के कारण देश की आर्थिक स्थिति पहले ही पतन के कगार पर खड़ी है. हथियारों की कमी और अंतरराष्ट्रीय दबाव ने अर्थव्यवस्था को और कमजोर कर दिया है. इसके बावजूद, सेना का आक्रामक रुख कम नहीं हो रहा है, जो देश के भीतर भविष्य में बड़े नागरिक असंतोष को जन्म दे सकता है.
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे खतरनाक पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य पर IRGC का बढ़ता कब्जा है. वैश्विक तेल पारगमन का यह सबसे महत्वपूर्ण मार्ग वर्तमान में सेना द्वारा पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया गया है. सेना का यह कदम अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मचा सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि IRGC अब सत्ता के पूर्ण केंद्रीकरण की दिशा में अंतिम कदम बढ़ा रही है. यदि यह स्थिति बनी रही, तो इससे न केवल क्षेत्रीय स्थिरता बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन भी बुरी तरह प्रभावित होगा.